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मंगलवार, 11 जनवरी 2011

श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः

राष्ट्रीय युवा दिवस पर विशेष

एक बहुत पुरानी कथा है | आपने भी सुनी होगी | मैं एक बार फिर से दुहराता हूँ | किसी नगर में एक लालाजी रहते थे | अपने बुद्धि और चातुर्य के बल पर उन्होंने अथाह धनराशी संकलित कर लिया था | उपभोक्ता अधिकारों का तो उन्हें इतना भान था , जितना आधुनिक काल में कन्जूमर फोरम के अधिकारियों को भी न होगा | लालाजी जिस वस्तु को एक बार भी देख लेते थे और उसका मूल्य निर्धारित कर देते थे , फिर उससे टस मस होना मुमकिन ही नहीं था | बार्गेनिंग करने में उनका कोई जवाब ही नहीं था | तात्पर्य यह की कोई भी उन्हें ठग नहीं सकता था | कहते हैं की गुण छुपाये नहीं छुपता , लिहाजा उनके इस व्यवहार कुशलता और व्यापारिक अंतर्दृष्टि की हनक पुरे देश में फ़ैल गई | इस बात को चार ठगों ने भी सुना | ठग भी बड़े धुरंधर | ऐसा कोई सयाना नहीं जिसको इन्होने ठगा न हो | ठगों ने लालाजी को ठगने का संकल्प लिया |” क्रतुमय पुरुषः” अर्थात मनुष्य संकल्पमय है | लिहाजा ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो मनुष्य ठान ले और वह पूर्ण न हो सके | भाग्य ने ठगों को लालाजी को ठगने का अवसर भी प्रदान कर दिया |

लालाजी के मन में एक गाय खरीदने की इच्छा ने जन्म लिया | टेंगना गांव में एक पशु मेला आयोजित हुआ | लालाजी वहाँ गएँ और एक उत्तम नस्ल की गाय उन्होंने ५०० रूपये देकर खरीद लिया | गाय को लेकर वे अपने घर आने लगे | चरों ठगों ने अलग अलग लालाजी की गाय को बकरी कहना शुरू कर दिया | पहले तो लालाजी क्रोधित हुए और पहले ठग को डाट कर भगा भी दिया लेकिन फिर वाही बात दूसरे ठग ने भी कही | लालाजी को बहुत गुस्सा आया साथ ही सशंकित भी हुए और जब तीसरे ठग ने भी गाय को बकरी कहा तो लालाजी से नहीं रहा गया और उन्होंने पूछ ही लिया , ” भाई ! तुम्हे हुआ क्या है ? इतनी लंबी चौड़ी गाय को बकरी क्यों कह रहे हो ? ठग ने कहा , श्रीमान जी ! लगता है आपकी आँखों को कुछ तकलीफ है | भला बकरी को बकरी नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ? अब लालाजी को काटो तो खून नहीं | ठग समझ गएँ की लाला जाल में फंस चूका है | चौथा ठग आया और उसने भी वही बात कही जो उससे पहले के ठगों ने कही थी , साथ ही लालाजी से पूछा की उन्होंने यह बकरी कहाँ से खरीदी है ? लालाजी ने बता दिया | अब वह ठग बोला , ” श्रीमान जी ! इसमे आपका कोई दोष नहीं | जिस गांव से आपने यह बकरी खरीदी है , उस गांव के लोग तंत्र मंत्र जानते है | उनके पास जादू की एक लकड़ी है जिसे वे लोग क्रेताओं के सिर पर फिरा देते हैं | क्रेताओं को इस बात का पता भी नहीं चलता और उन्हें बकरी , गाय और गाय ऊंट नजर आने लगती है | अच्छा आपने इस बकरी को कितने रुपये में ख़रीदा ? लालाजी ने बता दिया | ठग बड़े जोर से चिल्लाया , ” घोर कलियुग है भाइयों ! देखो किसी ने ५० रुपये की बकरी लालाजी को ५०० रुपये में बेच दी और लालाजी भी इसे गाय समझ कर बड़े शान के साथ लिए जा रहे हैं |” लालाजी अब सम्मोहित हो चुके थे | ठगों ने एक प्रस्ताव रखा , ” मान्यवर ! हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते , हाँ , इतना अवश्य है की जिस बकरी को आपने गाय समझ कर ५०० रुपये में क्रय किया है , उसे हम अधिक से अधिक १०० रूपये में खरीद सकते हैं ” मरता क्या न करता ? लालाजी ने हिसाब लगाया …..५० रुपये की बकरी का यह भला आदमी १०० रूपये दे रहा है , कुल मिलाकर ५० रूपये का मुनाफा होगा | जो गया सो गया ५० रुपये नफे में अब इस बकरी को बेच देने में ही भलाई है , और यह सोचकर लालाजी ने ५०० रुपये की गाय ठगों को मात्र १०० रूपये में बेच दी | मनोविज्ञान की भाषा में इसे CONFORMITY EFFECT कहते हैं | भारत के लगभग प्रत्येक मनोविज्ञानशाला में प्रतिवर्ष इससे सम्बंधित प्रयोग होते रहते हैं और सभी का परिणाम एक जैसा ही होता है | बड़े से बड़ा आत्मविश्वासी भी सामाजिक प्रभाव के समक्ष घुटने टेक देता है | प्रभाव सब पर पडता है , मात्रा अवश्य ही अलग अलग होती है |

यह तब की बात है जब हमारा देश वैचारिक पक्षाघात का शिकार हो चूका था | आक्रांताओं ने इसे सम्मोहित कर रखा था | भारतीयों के मन में यह बात बैठा दी गई थी कि उनकी कोई जीवन पद्यति नहीं , उनका कोई व्यक्तित्व नहीं | वे काफिर हैं , वे मुशरिक हैं , वे हीदन हैं , वे पेगन हैं | भारत सपेरों का देश है | जादूगरों का देश है | असम में जावोगे तो वहां कि औरते तुम्हें मक्खी बना लेगी | तिब्बत में जावोगे तो लामाओं का बोझा ढोना होगा | समुद्र यात्रा करना महापाप है | भारत का सम्पूर्ण ज्ञान ब्रिटिश पुस्तकालय में रखे एक अलमारी से अधिक कुछ नहीं | बनारस ठगों कि राजधानी है | हरिद्वार में व्यभिचारी संतों का चोगा ओढकर कानून को धोखा देते हैं | शिवाजी एक लुटेरे थे | भारत में औरतों को जबरदस्ती आदमियों के साथ फूंक दिया जाता है | भारतीय अशिक्षित हैं | हिंदू जैसा कोई शब्द नहीं | भारतीयों की कोई राजनैतिक चेतना नहीं , उनकी कोई सामाजिक , आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान नहीं | भारतीय न तो विचारक हो सकते हैं और न ही दार्शनिक | यहाँ आडम्बर और झूठ का बोलबाला है | भारतीय एक अच्छा वकील , एक अच्छा राजनेता , एक अच्छा वैज्ञानिक , एक अच्छा खिलाडी और एक अच्छा सिपाही हो ही नहीं सकता | यह तो White Man’s Burden है | जो लोग बकरदाढ़ी रखते थे उनका सम्मान किया जाता था और शिखा धारण करने वालों का मखौल उडाया जाता था | लोग अपने आपको हिंदू कहने में शर्माने लगे | “” दासता में ही मुक्ति है और प्रभुता में दासत्व ” को अपना आदर्श मानने वाली हमारी सामाजिक व्यवस्था ने पहली बार राजनैतिक दासता का दंश झेला था | यह रामगुलाम वाली आध्यात्मिक दासता नहीं जिसमे एक ब्राम्हण तुलसीदास और एक शुद्र रैदास में राम का सबसे बड़ा गुलाम बनने की सात्विक स्पर्धा हो , यह तो आयातित निरंकुश राजसत्ता की मदांध पाशविक दासता थी एकदम से ”जाके मुख देखे दुःख उपजत , ताको करिबो पडो सलाम ” वाली दुर्दांत दासता |

ऐसे समय में १२ जनवरी सन १८६३ को बंगाल प्रान्त के कलकत्ता में एक संभ्रांत कायस्थ परिवार में बालक नरेन्द्रनाथ का जन्म होता है | सूर्य मकर राशि का संक्रमण कर रहे थे | एक नए युग का प्रादुर्भाव होना था | होनहार बिरवान के होत चीकने पात | यही बालक आगे चलकर भारतीय पुनर्जागरण का सबसे बड़ा उत्प्रेरक स्वामी विवेकानंद बनता है | जब हिंदू सिर झुकाकर इस तरह से अपना परिचय देते थे मानों कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया हो तब वैज्ञानिक समृद्धि के शिखर पर विराजमान अमेरिका में स्वामी विवेकानंद की सिंह गर्जना सुनाई पड़ती है गर्व से कहो की हम हिंदू है और सारा संसार मत्रमुग्ध सा स्वामीजी के इस कथन का अनुसमर्थन करता है | यह कथन किसी ऐरे गैरे नत्थुखैरे का नहीं डेविड ह्यूम , इम्मान्युअल कांट , फित्से , स्पिनोजा , हीगल , स्कोपेन्हावर , आगस्ट काम्टे , हरबर्ट स्पेंसर , जान स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन जैसे उद्भट पाश्चात्य विद्वानों और उनकी सम्पूर्ण कृतिओं को कंठस्थ कर लेने वाले अप्रतिम अध्येता स्वामी विवेकानंद का था |

उत्थान पतन सृष्टि का अपरिवर्तनीय नियम है | जो जन्म लेता है उसे मरना ही पड़ता है | संसार के सभी व्यक्तियों को सांसारिक कष्ट भोगने पड़ते हैं | स्वामी विवेकानंद को भी इन परिस्थितियों से दो चार होना पड़ा | समय ने उन्हें दाने दाने का मुहताज बना दिया | घर के बर्तन भांड सब कर्ज चुकाने में चले गए | आध्यात्मिक चेतना , भौतिक क्षुधा के सामने नतमस्तक होने ही वाली थी | विवेकानंद ने अपना संकट अपने गुरु के सामने रखा | रामकृष्ण परमहंस ने कहा जाओ माँ से अपनी व्यथा व्यक्त करो , मैं नहीं जाता | विवेकानंद तीन बार गए | तीनों बार उन्होंने ज्ञान , विवेक , प्रज्ञा , धृति ही माँगा | सूरदास कहू कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै | धन की याचना उनके कंठ से नहीं निकली | गुरु को अपनी ओर से कहना पड़ा …..जाओ , तुम्हे खाने और पहनने की कोई कमी नहीं होगी | किशोरावस्था में जिस ईश्वर के अस्तित्व को उन्होंने ख़ारिज कर दिया था , वही ईश्वर अब प्रतिपल छाये की भांति उनके साथ था | मनुष्यों को जिस प्रकार मनुष्य दिखाई पड़ते हैं , उनको आत्म्ब्र्म्ह दिखाई पडता था | मात्र उदर का ही पोषण उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था , उन्हें तो भारतीयों की खोई अस्मिता उन्हें लौटानी थी |

डॉ विलियम हस्ती ने लिखा ,” नरेंद्र वास्तव में एक प्रतिभाशाली बालक है | मैंने दूर दूर तक यात्रा की किन्तु उसके जैसी संभावनाओं और क्षमताओं वाला कोई लड़का जर्मन विश्वविद्यालयों के दर्शन विभागों में भी नहीं मिला ”

सन १८८८ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के स्वर्गवास के उपरांत स्वामी विवेकानंद युवा सन्यासी के वेश में भारत भ्रमण को निकल पड़े | करतल भिक्षा , तरुतल वासः का उद्देश्य लेकर पैदल ही उन्होंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया | बार बार उनके मन में एक ही विचार आता ….मुझे गुरुदेव ने निर्विकल्प समाधी के सुख से वंचित क्यों किया ? वह कौन सा कार्य है जो वह अज्ञात सत्ता मुझसे करवाना चाहती है ?

भारत भ्रमण के दौरान उन्हें विभिन्न प्रकार के अनुभव हुए | वाराणसी के दुर्गाकुंड नामक स्थान पर उन्हें बंदरों ने दौड़ा लिया | स्वामीजी सरपट भागे | पास ही एक अन्य तरुण सन्यासी साधनारत था | उसने चिल्ला कर कहा ….भागो मत , रुको और मुकाबला करो |नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः यह आत्मा बलहीनों के लिए नहीं है | उपनिषदों का यह घोष वाक्य मानों सजीव हो उठा | काशी से प्राप्त यह शिक्षा आजीवन उनके साथ रही |

फिर वह दिन भी आया जब पूरा विश्व वेदों , उपनिषदों , पुराणों , स्मृतियों और महाकाव्यों में वर्णित महान सत्य का साक्षात्कार करने को व्यग्र हो उठा ११ सितम्बर १८९३ शिकागो ( जहाँ पहले केवल एक जंगली प्याज शिकागो उगा करती थी ) के आर्ट इन्स्टिच्युट में भारत की सनातन मेधा स्वामी विवेकानन्द का आश्रय पाकर फूट पड़ी | श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ……हे विश्व के अमृत पुत्रों सुनों …या दूसरे शब्दों में मेरे अमेरिका निवासी भगिनी और भात्रिगन | इससे पहले के सारे वक्ता मलिन हो गए | स्वामीजी ने एक संक्षिप्त सा उद्बोधन दिया और सात हजार श्रोता मत्रमुग्ध होकर लगातार दो मिनट तक ताली ही बजाते रहें | मानों सरस्वती स्वयं पुरुष वेश धारण कर अपने दिव्य वीणा का वादन कर रही हों | आधुनिकता अकुर पाशविक स्पर्धा की चक्की में पिसते पश्चिमी जगत में सबको अपना मानने वाली दिव्यसत्ता का आध्यात्मिक महाविस्फोट हुआ था | ऐसा महान सन्देश अमेरिकियों ने पहले कभी नहीं सुना था | दूसरे दिन अमेरिका के समस्त समाचार पत्र स्वामी जी के भाषण से पटे पड़े थे |

New York Herald ने लिखा ,” Vivekanand is undoubtedly the greatest figure in the parliament of religions , After hearing him , we feel how foolish it is to send missionaries to this learned nation “

स्वामी विवेकानंद ने सम्पूर्ण अमेरिका और यूरोप का भ्रमण किया और | स्थान स्थान पर उनके प्रवचन आयोजित किये गए | पाश्चात्य जगत द्वारा भारत पर लगाया गया कलंक एक झटके में नेस्तनाबूद हो गया | हमारी सभ्यता रोम और यूनान की सभ्यता से भी अधिक प्राचीन है और अक्षुण्ण है ….इस तरह का भाव एक बार फिर से भारत भुवन में प्रसारित होने लगी |

यह बात कतिपय लोगों को अच्छी नहीं लगी है | भारत की कोई मूल सभ्यता नहीं , आर्य भी अन्यों की भांति एक आक्रांता थे | इस तरह का मिथ्या प्रचार अब भी बदस्तूर जारी है | हे विवेकानंद ! तुम कब आओगे ?

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

वन्देमातरम कहना होगा

बेशक तुमने अपमान किया।खण्डित भारत का मान किया॥
यह वंदेमातरम सम्प्रदाय का परिचायक है,मान लिया॥
आओ,मै तुम्हे बताता हूँ,इस वंदेमातरम की सत्ता।
तुमको उसका भी ज्ञान नहीँ जो जान चुका पत्ता-पत्ता॥
जो ज्ञानशून्य भू पर बरसी,बन,शून्य-ज्ञान की रसधारा।
दशमलव दिया इसने तब,जब था बेसुध भूमण्डल सारा॥
जब तुमलोगोँ के पुरखोँ को ईमान का था कुछ भान नहीँ।
कच्चा ही बोटी खाते थे, वस्त्रोँ का भी था ज्ञान नहीँ।
जंगल-जंगल मेँ पत्थर ले, नंगे-अधनंगे फिरते थे।
सर्दी-गर्मी-वर्षा अपने उघरे तन पर ही सहते थे।।
तब वंदेमातरम के साधक, माँ चामुण्डा के आराधक।
अज्ञान तिमिर का जो नाशक,था ढूँढ़ लिया हमने पावक॥
मलमल के छोटे टुकड़े से, उन्मत्त गजोँ को बाँध दिया।
दुःशासन का पौरुष हारा, पट से पाञ्चाली लाद दिया॥
जब वंदेमातरम संस्कृति को था किसी सर्प ने ललकारा।
तब लगा अचानक ही चढ़ने जनमेजय के मख का पारा॥
यह वंदेमातरम उसी शक्तिशाली युग की शुभ गाथा है।
जिसके आगे भू के सारे नर का झुक जाता माथा है॥
इसका प्रथमाक्षर चार वेद,द्वितीयाक्षर देता दया,दान।
तृतीयाक्षर माँ के चरणोँ मेँ,अर्पित ऋषियोँ का तप महान॥
पञ्चम अक्षर रणभेरी है,अंतिम मारु का मृत्युनाद।
चिर उत्कीलित यह मंत्र मानवोँ की स्वतंत्रता का निनाद॥
जो स्वतंत्रता का चरम मंत्र,जो दीवानोँ की गायत्री।
जो महाकाल की परिभाषा,भारत माँ की जीवनपत्री॥
जो बलिदानोँ का प्रेरक है,जो कालकूट की प्याली है।
जो है पौरुष का बीजमंत्र, जिसकी देवी माँ काली है॥
जो पृथ्वीराज का क्षमादान, गोरी का खण्डित हुआ मान।
जो जौहर की हर ज्वाला है, जो आत्मत्याग की हाला है॥
जिसमेँ ऋषियोँ की वाणी है, जो शुभदा है, कल्याणी है।
जो राष्ट्र-गगन का इन्द्रधनुष,उच्चारण मंगलकारी है॥
जिसमेँ दधीचि की हड्डी है, हाँ,हाँ जिसमेँ खुद चण्डी है।
जो पुरुषोत्तम का तीर धनुष,हाँ जिसमेँ हैँ नल,नील,नहुष॥
राणा-प्रताप का भाला है, विष कालकूट ने डाला है।
जो प्रलय मचाने वाला है,इसको विद्युत ने पाला है॥
इसमेँ शंकर का दर्शन है, जिसका भावार्थ समर्पण है।
जो बजरंगी का ब्रम्हचर्य, जो आत्मबोध का दर्पण है॥
यह वागीश्वरी का सौम्य तेज,अम्बर से झरता झर-झर है।
यह चामुण्डा के हाँथो मेँ शोणित छलकाता खप्पर है॥
जो मनुपुत्रोँ के लिये स्वर्ग, सर्वात्मवाद की धुरी रही।
जिसमेँ देवोँ की दैविकता अमृत बरसाती सदा रही॥
उस ऐक्य मंत्र के ताने को,तेजस्वी गैरिक बाने को।
उर्जा की दाहक गर्मी को, उस मानवता को,नरमी को॥
गंगाधर के शिव स्वपनोँ मेँ, नेताजी के बलि भवनोँ मेँ।
गौतम के मंगल कथनोँ मेँ, मीरा के सुन्दर भजनोँ मेँ॥
यह किसने आग लगाया है, जग को उल्टा बतलाया है॥
यह किसने आग लगाया है, जग को उल्टा बतलाया है॥
यह वंदेमातरम शब्द नहीँ यह भारत माँ की पूजा है।
माँ के माथे की बिँदिया हैश्रृंगार न कोई दूजा है॥
इसमेँ तलवार चमकती है मर्दानी रानी झाँसी की।
इसमेँ बलिदान मचलता है,दिखती हैँ गाँठे फाँसी की॥
मंगल पाण्डे की यादेँ हैँ।शिवराज नृपति की साँसेँ हैँ॥
यह बिस्मिल के भगवान वेद।यह लौह पुरुष का रक्त स्वेद॥
यह भगत सिँह की धड़कन है।आजाद भुजा की फड़कन है॥
यह गंगाधर की गीता है, चित्तू पाण्डे सा चीता है।
जलियावाला की साखी है।हुमायूँ बाहु की राखी है॥
यह मदनलाल की गोली है।मस्तानी ब्रज की होली है॥
यह चार दिनोँ के जीवन मेँ चिर सत्य,सनातन यौवन है।
यह बलिदानोँ की परम्परा अठ्ठारह सौ सत्तावन है॥
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसा के बन्दे सब इसको गाते हैँ।
सब इसे सलामी देते हैँ,इसको सुन सब हर्षाते हैँ॥
लेकिन कुछ राष्ट्रद्रोहियोँ ने है इसका भी अपमान किया।
इस राष्ट्रमंत्र को इन लोगोँ ने सम्प्रदाय का नाम दिया॥
जाओ,जाकर पैगम्बर से पूछो तो क्या बतलाते हैँ?
वे भी माता के पगतल मेँ जन्नत की छटा दिखाते हैँ।
यह देखो सूली पर चढ़कर क्या कहता मरियम का बेटा।
हे ईश्वर इनको क्षमा करो जो आज बने हैँ जननेता।।
ये नहीँ जानते इनकी यह गल्ती क्या रंग दिखलायेगी।
इस शक्तिमंत्र से वञ्चित हो माँ की ममता घुट जायेगी॥
गोविन्द सिँह भी चण्डी का पूजन करते मिर जायेँगे।
शिव पत्नी से वर लेकर ही संघर्ष कमल खिल पायेँगे।
फिर बोलो माँ की पूजा का यह मंत्र कम्यूनल कैसे है?
माँ को महान कहने वाला शुभ तंत्र कम्यूनल कैसे है?
तुम केवल झूठी बातोँ पर जनमानस को भड़काते हो।
गुण्डोँ के बल पर नायक बन केवल विद्वेष लुटाते हो॥
लेकिन,जब यह घट फूटेगा।जब कोप बवंडर छूटेगा॥
जब प्रलय नटी उठ नाचेगी।भारत की जनता जागेगी॥
तब देश मेँ यदि रहना होगा।तो वंदेमातरम कहना होगा॥
मनोज कुमार सिंह ‘मयंक’

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

वेक अप इंडिया

यदि आप हिंदू, हिन्दुधर्म की रक्षा नहीं करेंगे तो कौन करेगा? यदि भारत माँ की संताने ही उसके धर्म का पालन न करेंगी तो उसे कौन बचायेगा?केवल भारत ही भारत को बचा सकता है| भारत और हिंदू धर्म एक है|हिंदू धर्म के अभाव में भारत का कोई भविष्य नहीं है|हिंदू धर्म, भारत की कब्र में चला जायेगा|तब भारत पुराशास्त्रियों और पुरातत्वज्ञों का विषय मात्र रह जायेगा और तब भारत न तो देशभक्ति वाला देश रह जायेगा और न एक राष्ट्र|

श्रीमती बासंती देवी (डा.एनी बेसेंट )

यह आर एस एस के विचार नहीं हैं|हिंदू जागरण मंच ने इसे नहीं कहा|किसी हिंदू आतंकवादी को ऐसा कहते मैंने नहीं सुना|आचार्य गिरिराज किशोर, प्रवीन तोगड़िया,अशोक सिंघल या योगी आदित्यनाथ ने पुरातत्व संग्रहालय वाली भाषा बोली है की नहीं यह मैं नहीं जानता|यह भाषण तो एक ऐसे हिंदू आतंकवादी ने बोला है जिसका जन्म १ अक्टूबर १८४७ को लन्दन में हुआ|१८८२ तक वह एक ईसाई रहीं|१८८९ तक उनके दार्शनिक विचारों का परिपक्वन होता रहा,इसी वर्ष उन्होंने अपने आपको थियोसोफिस्ट घोषित किया|उन्होंने १८९३ में हिंदू शब्द का मुखौटा पहना|७ जुलाई १८९८ को सेन्ट्रल सनातन कालेज नहीं सेंट्रल हिंदू कालेज की स्थापना की, जो आगे चलकर प्रातः स्मरणीय महामना मदन मोहन मालवीय जी द्वारा स्थापित कशी हिंदू विश्वविद्यालय का आधार बना|डॉ. एनी बेसेंट को भी शब्दों का निरुक्तिक विन्यास करना आता था|

जब डॉ. अफीज मोहम्मद सैयद ने ब्रिटिश एनसाइक्लोपीडिया में लिखा ” विश्वबंधुत्व और जगंमैत्री की भावनाओं से परिश्रुत होने पर भी श्रीमती बेसेंट को वेदों और ऋषियों के देश भारत से,गौरवपूर्ण अतीत के अधिकारों पर अब दुर्दिन में फंसे और चारों ओर से निन्दित भारत माता की संतान से विशेष प्रेम था| तब उन्होंने हिंदुत्व को ही संबोधित किया|

प्रत्येक देश का अपना एक राष्ट्रिय चरित्र होता है|मनोविज्ञान में इस पर व्यापक शोध हुए हैं|जो बात एक संस्कृति में सत्य है, वह दूसरी संस्कृति पर थोपना न सिर्फ हास्यास्पद है वरन आत्महंता है| मिस्त्र और मेसोपोटामिया ने पुरे विश्व को रिलीजन दिया, यूनान ने ब्यूटी दिया,रोम ने ला दिया,इरान ने प्योरिटी दिया,चल्दिया ने साइंस दिया और भारत ने धर्म| मैं अपने पहले के ब्लॉग “धर्म क्या है’ में इस विषय पर पहले ही लिख चूका हूँ|फिर भी पता नहीं क्यों जो लोग न तो पन्ने पलट कर देखना चाहते हैं और न ही संदर्भो को समझना चाहते हैं, न जाने लिखवास की किस अन्तःप्रेरणा के वशीभूत होकर बिना किसी सन्दर्भ,उद्धरण और साक्ष्य के प्रस्तुत किये ही वैचारिक विकृति के प्रतीक संशय ग्रस्त लेखन में ही अपने वृद्ध पौरुष का मिथ्या प्रदर्शन करते नहीं अघाते|

कहा जाता है की अंग्रेजों ने इंदु अथवा सिंधु को इंडो कहा और यह इंडियन हो गया| अरबों ने सिंधु को हिंदू कहा और यह हिन्दुस्थान हो गया| इंडियन ओशेन अथवा हिंद महासागर भी तो हिंदू ही है| अब यह संशय होगा की अगर हिंदू शब्द हिंदुओं की देन होती तो वेदों में इसका उल्लेख क्यों नहीं है? पुराणों में तो होना ही चाहिए| वेदों में आर्य है, अनार्य है, दस्यु है, दास है, ब्राम्हण है, क्षत्रिय है, वैश्य है, राजा है, शुद्र है तो हिंदू क्यों नहीं? अरे भैया आपने गीता पढ़ी है? त्रैगुण्यविषया वेदाः, निःस्त्रैगुन्यों भवार्जुन अर्थात वेद सत्व, रज और तम की ही चर्चा करते हैं, अर्जुन तू इससे परे हो जा| फिर वेदों में निः स्त्रैगुन्यता का प्रतीक यह शब्द हिंदू आता कहाँ से? आपने बृहस्पति आगम पढ़ी है? चलिए मैं उसका एक श्लोक बताता हूँ…….हिमालयात समारभ्य यावत इंदु सरोवरम|तं देव निर्मितं देशं हिन्दुस्थानाम प्रचक्षते|| अर्थात हिमालय से प्रारंभ होकर इंदु सरोवर (हिंद महासागर) तक यह देवताओं द्वारा निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है| कम से कम बृहस्पति आगम तो तब ही लिख दिया गया था जब इस्लाम का कहीं अता पता भी नहीं था और ईसा मूसा तो अपने अस्तित्व में भी नहीं आये थे| अगर आपकी मान्यता के मुताबिक हिंदू एक फारसी शब्द है और फारसी में समस्त भारतीय स का ह हो जाता है तो सरस्वती हरह्वती क्यों नहीं हुई? समरकंद हमरकन्द क्यों नहीं हुआ? सीता की हिता क्यों नहीं कहा गया? सावित्री को हवित्री क्यों नहीं कहते?शायद को हायद क्यों नहीं कहा जाता? सारे जहाँ से अच्छा को हारे जहाँ से अच्छा क्यों नहीं कहते? साला को हाला क्यों नहीं कहा जाता? सूफी को हूफी क्यों नहीं कहते? सिलसिला को हिलहिला क्यों नहीं कहा जाता? सफा को हफ़ा क्यों नहीं कहा जाता? शमशुद्दीन को हम्हुद्दीन क्यों नहीं कहते? इल्तुतमिश को इल्तुत्मिह् काहे को नहीं नहीं कहा जाता और तो और ईरानियों का पौराणिक वंश भी अफरा सियाब की जगह अफरा हियाब होना चाहिए था| ऐसा तो होता नहीं की भाषागत अक्षमता की वजह से किसी शब्द को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाए और शेष शब्दों में मनचाहा परिवर्तन कर दिया जाए| निरुक्त की दृष्टि से भी मातृ का मदर और मैटर होना तो आसान है किन्तु सिंधु का हिंदू हो जाना सिरे से ही गलत है|बीच के बिंदु को छोड़कर शेष दोनों अक्षर पूरी तरह से परिवर्तित हो जाएँ, यह कहाँ से संभव है?

सनातन धर्म, वैदिक धर्म, आर्य धर्म, ब्राम्हण धर्म, आर्ष धर्म, आर्यत्व, हिंदुत्व, मानवता इत्यादि इसके पर्यायवाची हैं जो हिंदू नामक एक व्यापक शब्द में इसी भांति समाहित हैं जैसे शर्बत में शक्कर और जल| बौद्ध, जैन, आर्य, अनार्य, सिख, वैष्णव, शाक्त, शैव, गाणपत्य, तंत्रागम इत्यादि हिंदू रूपी विशाल वट वृक्ष की शाखा – प्रशाखाएं हैं| गर्व से कहो की हम हिंदू हैं किसी हिंदूवादी संगठन द्वारा आविष्कृत नया नारा नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विश्व में भारत की अप्रतिम सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक स्वामी विवेकानंद की सिंह गर्जना है| इंडोनेशिया में हिंदू को हिंदू आगम कहा जाता है|

यं वैदिकाः मंत्रदृशः पुराणा

इन्द्रं, यमं मातरिश्वानमाहुः|

वेदान्तिनो निर्वचनीय मेकं,

यं ब्रम्ह शब्देन विनिर्दिशंती |

शास्तेती केचित, कतिचित कुमारः,

स्वामिति, मातेति, पितेती भक्त्या|

बुद्ध्स्तथार्ह्न्नीति बौद्ध जैनः,

सत श्री अकालेती च सिक्ख सन्तः|

यं प्रार्थयन्ते जग्दिशितारं|

स एक एव प्रभुरद्वितीयः|

अर्थात मन्त्रदृष्टा ऋषियों ने वेदों और पुराणों में जिन्हें इंद्र, यम, अर्यमा और अश्विनी कह कर पुकारा है, वेदान्तियों ने जिस अनिर्वचनीय को ब्रम्ह नामक शब्द से निर्दिष्ट किया है| शास्ता, कुमार, माता, पिता और स्वामिभक्ति के रूप में हम जिस परम तत्व को पूजते हैं बौद्धों ने जिन्हें बुद्ध और जैनियों ने जिन्हें अर्हत कह कर पुकारा है| सिख संतों ने जिस परमात्मा को सत् श्री अकाल का संबोधन दिया है, वह हिंदुओं का जगदीश्वर एक ही है|

हिंदू शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य अमृत में एक बड़ा ही विचारोत्तेजक लेख लिखा है|आचार्य जी के अनुसार ”फारसी में हिंदू शब्द यद्यपि रुढ हो गया है तथापि यह उस भाषा का नहीं है|लोगों का ख्याल की फारसी का हिंदू शब्द संस्कृत सिंधु का अपभ्रंश है, वह लोगों का केवल भ्रम है|ऐसे अनेक शब्द हैं,जो भिन्न-भिन्न भाषाओँ में एक ही रूप में पाये जाते हैं|यहाँ तक की उनका अर्थ भी कहीं कहीं एक ही है; पर वे सब भिन्न भिन्न धातुओं से निकले हैं|” फारसी में हिंदू शब्द का अर्थ है चोर, डाकू, रहजन, गुलाम, काला, काफ़िर इत्यादि|क्या एक ऐसा शब्द जिसमें स्पष्ट रूप से अपमान परिलक्षित होता हो कोई जाति बडे ही गौरव के साथ अपना लेगी और जबकि इससे स्पष्ट रूप से उसकी पहचान जुडी हो| नहीं कदापि नहीं, और क्या अब तक इस तथ्य से हमारे पूर्व पुरुष अनजान रहे होंगे,ऐसा भी नहीं है|अब प्रशन यह उठता है की आखिर हिंदू शब्द का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख किस ग्रन्थ में मिलता है और वहाँ उसका अर्थ क्या है? हिंदू शब्द का सर्वाधिक पुराना उल्लेख अग्निपूजक आर्यों के पवित्रतम ग्रन्थ जेंदावस्ता में मिलता है? क्यों वेदों में क्यों नहीं? क्योंकि अग्निपूजक आर्य और इन्द्र्पुजक आर्य एक ही आर्य जाती की दो शाखाएं थी|इस्लामिक बर्बरता का सबसे पहला निशाना यही बना|अग्निपूजक आर्यों की पूरी प्रजाति ही नष्ट कर दी गयी|उनके पवित्रतम ग्रन्थ का चतुर्थांश भी नहीं बचा| जेंदावस्ता और वेद में ९० फीसदी समानता है, कुरान और वेद में २ फीसदी| वस्तुतः जेंदावस्ता और वेद लगभग समकालीन माने जा सकते हैं| ईसाईयों के अनुसार “बाइबिल” का पुराना भाग ईसा मसीह से भी पांच हजार साल पुराना है|our zendavesta is as anciat as the creation;it is as old as the sun or the moon.इसी जेंदावेस्ता में हनद नाम का एक शब्द मिलता है और हिन्दव नाम के एक पहाड़ का भी वर्णन मिलता है| जेंदावेस्ता का यह हनद ही आज का हिंदू और हिन्दव हिंदुकुश नाम की पहाड़ी है| अब प्रश्न यह उठता है की जब पारसी और वर्तमान हिंदू दोनों ही आर्य फिर उन्हें पारसी और हमें हनद क्यों कहा गया? स्पष्ट है भौगोलिक आधार पर भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए| अब इस पारसी/हिब्रू हनद या हिंदू का अर्थ भी समझ लीजिए| इसका अर्थ होता है विक्रम, गौरव, विभव, प्रजा, शक्ति प्रभाव इत्यादि|यह अर्थ न तो अपमानजनक है और न ही अश्लील| इसी लिए हिंदुओं ने इसे अपने प्रत्येक परवर्ती ग्रंथो में भारत,सनातन,आर्य इत्यादि के पर्यायवाची के रूप में ज्यों का त्यों स्वीकार किया है|

एतत्देशप्रसुतस्य सकाशादाग्रजन्म:|

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन, पृथिव्याः सर्वमानवा:||

अर्थात इस प्रकार देश में उत्पन्न होने वाले, अपने पहले के लोगों से शिक्षा ग्रहण करें|पृथ्वी क्व समस्त मानव अपने अपने चरित्र से इस लोक को शिक्षा प्रदान करें|यह हिंदुत्व का आदर्श है |

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे,ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत|

ग्रामं जनपदस्यार्थे, आत्मार्थे पृथ्वीं त्यजेत ||

अर्थात कुल के लिए स्वयं का, ग्राम के लिए कुल का,जनपद के लिए ग्राम का और मानवता के लिए पृथ्वी तक का परित्याग कर दे| इस तरह का उपदेश हिंदुओं को परंपरा से प्राप्त है|

यूँ तो कहने को बहुत से लोग अपने आपको धरती पुत्र कहते मिल जायेंगे किन्तु माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः अर्थात धरती माता है और हम पृथ्वी के पुत्र हैं का स्पष्ट उद्घोष करने के कारण वास्तव में हिंदू ही समाजवादी धरतीपुत्र कहलाने का वास्तविक अधिकारी है| हिंदू नमक शब्द पर भ्रम का वातावरण सृजित करने वाले तथाकथित छद्म (अ)बुद्धिजीवी प्राणी हिंदू शब्द के कुछ और विशलेषण देखें -

हिन्सायाम दुश्यते यस्य स हिंदू – अर्थात हिंसा से दूर रहने वाला हिंदू

हन्ति दुर्जनं यस्य स हिंदू – अर्थात दुष्टों का दमन करने वाला हिंदू

हीं दुष्यति यस्य स हिंदू – अर्थात हिंसकों का विनाश करने वाला हिंदू

हीनं दुष्यति स हिंदू – अर्थात निम्नता को दूषित समझने वाला हिंदू

आपको इसमें से जो भी हिंदू अच्छा लगता हो आप चुन सकते है….यहाँ कम से कम इतनी आजादी तो है ही| अच्छा अब हिंदू शब्द की एक परिभाषा भी दिए देते है, हो सकता है आपको कुछ अच्छा लग जाये|

गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ: मति:|

पुनर्जन्मनि विश्वास:,स वे हिन्दुरिती स्मृत:||

अर्थात गोमाता, ओंकार और पुनर्जन्म में आस्था रखने वाला हिंदू |डॉ भीमराव अम्बेडकर जी भी इस तथ्य से अपरिचित नहीं थे इसीलिए जब विभाजनकारी सिखों ने अपने आपको हिंदुओं से अलग चिन्हित किये जाने की मांग की, तो वे तन कर खड़े हो गए और बौद्ध,जैन,सनातनी,सिख सभी को हिंदू माना|वेदों में हिंदू का पर्यायवाची शब्द भारत या आर्य शताधिक बार आया है| विष्णुपुराण में तो हिंदुओं के नाम भारत की पक्की रजिस्ट्री ही हो गयी है, वह भी चौहद्दी बांधकर|ध्यान दीजियेगा -

उत्तरं यद् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिण|

वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र संतति:||

अर्थात जो समुद्र से उत्तर है (चौहद्दी न. १ ) और हिमालय से दक्षिण है (चौहद्दी न. २ ) वह भारत नाम का भूभाग है और उसकी संतति, संतान (हिंदू ) भारतीय हैं|

जहाँ तक मेरी जानकारी है| यह श्लोक ईसा या मूसा से कुछ पहले का तो होगा ही और नहीं तो गुप्तकाल का होना तो निश्चित ही है| कलिका पुराण और मेरु तंत्र में हिंदू ज्यों का त्यों आया है|वर्तमान हिंदू ला के मुताबिक वेदों में विश्वास रखने वाला हिंदू माना गया है|आज तो ९० प्रतिशत हिंदुओं ने वेद देखा भी नहीं होगा तो क्या हिंदू ला के अनुसार वे हिंदू नहीं होने चाहिए| स्पष्ट है की हिंदू शब्द आर्य और भारत की ही भांति श्रेष्ठता और गौरव का बोधक होने के कारण स्वयं में पूर्ण है और आस्तिक, नास्तिक वेद, लवेद के आधार पर कोई भेद विभेद नहीं करता|

हिंदुओं को उनके जातीय चेतना से पृथक करने और आत्म विस्मृति के निरंतर प्रयासों ने ही आज पुरे भारत में विभाजन से पूर्व की स्थिति का निर्माण कर दिया है|आश्चर्य की बात तो यह है की लगातार २ सौ सालों तक जिस आत्मविस्मृति की मदिरा पिलाकर अंग्रजों ने सम्पूर्ण भारत में शासन किया,आजादी के पश्चात कांग्रेस और अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल और छद्म बुद्धिजीवी आज भी जनता को वही मदिरा पिला रहे हैं|विभाजन के समय लीगी नेताओं द्वारा लड़ के लिया है पाकिस्तान,हंस के लेंगे हिंदुस्तान जैसा नारा लगाया जाता था और आज इंडियन मुजहिद्दीन अथवा हिंदू मुजाहिद्दीन (अर्थ का अनर्थ न किया जाये…इंडियन का अर्थ हिंदू ही होता है) जैसे हिंदू इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा धमाके करके किया जा रहा है| कुछ लोग हिंदी को एक भाषा मानते हैं ………………

मैं हिंदी ठेठ हिंदी खून हिंदी जात हिंदी हूँ , यही मजहब यही फिरका यही है खानदा मेरा|

भैया जहाँ जहाँ मैंने गलती से हिंदी लिख दिया होगा हिंदू हिंदू कर लीजियेगा|
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