बुधवार, 23 मार्च 2011
तुम हरामी नहीँ हो
तुम हरामी नहीँ हो
और हरामजादा भी नहीँ।
लेकिन,
जो कुछ भी तुम हो -
उसके लिए -
यह दोनोँ शब्द -
हरामी और हरामजादा -
बहुत छोटे हैँ।
क्योँकि -
हरामी और हरामजादे -
अपनी वल्दियत नहीँ जानते,
और तुमने,
अपनी माँ को -
योरप, अमेरिका, चीन और अरब की गलियोँ मेँ,
नीलाम कर दिया।
www.atharvavedamanoj.jagranjunction.com
मंगलवार, 11 जनवरी 2011
श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः
राष्ट्रीय युवा दिवस पर विशेष
एक बहुत पुरानी कथा है | आपने भी सुनी होगी | मैं एक बार फिर से दुहराता हूँ | किसी नगर में एक लालाजी रहते थे | अपने बुद्धि और चातुर्य के बल पर उन्होंने अथाह धनराशी संकलित कर लिया था | उपभोक्ता अधिकारों का तो उन्हें इतना भान था , जितना आधुनिक काल में कन्जूमर फोरम के अधिकारियों को भी न होगा | लालाजी जिस वस्तु को एक बार भी देख लेते थे और उसका मूल्य निर्धारित कर देते थे , फिर उससे टस मस होना मुमकिन ही नहीं था | बार्गेनिंग करने में उनका कोई जवाब ही नहीं था | तात्पर्य यह की कोई भी उन्हें ठग नहीं सकता था | कहते हैं की गुण छुपाये नहीं छुपता , लिहाजा उनके इस व्यवहार कुशलता और व्यापारिक अंतर्दृष्टि की हनक पुरे देश में फ़ैल गई | इस बात को चार ठगों ने भी सुना | ठग भी बड़े धुरंधर | ऐसा कोई सयाना नहीं जिसको इन्होने ठगा न हो | ठगों ने लालाजी को ठगने का संकल्प लिया |” क्रतुमय पुरुषः” अर्थात मनुष्य संकल्पमय है | लिहाजा ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो मनुष्य ठान ले और वह पूर्ण न हो सके | भाग्य ने ठगों को लालाजी को ठगने का अवसर भी प्रदान कर दिया |
लालाजी के मन में एक गाय खरीदने की इच्छा ने जन्म लिया | टेंगना गांव में एक पशु मेला आयोजित हुआ | लालाजी वहाँ गएँ और एक उत्तम नस्ल की गाय उन्होंने ५०० रूपये देकर खरीद लिया | गाय को लेकर वे अपने घर आने लगे | चरों ठगों ने अलग अलग लालाजी की गाय को बकरी कहना शुरू कर दिया | पहले तो लालाजी क्रोधित हुए और पहले ठग को डाट कर भगा भी दिया लेकिन फिर वाही बात दूसरे ठग ने भी कही | लालाजी को बहुत गुस्सा आया साथ ही सशंकित भी हुए और जब तीसरे ठग ने भी गाय को बकरी कहा तो लालाजी से नहीं रहा गया और उन्होंने पूछ ही लिया , ” भाई ! तुम्हे हुआ क्या है ? इतनी लंबी चौड़ी गाय को बकरी क्यों कह रहे हो ? ठग ने कहा , श्रीमान जी ! लगता है आपकी आँखों को कुछ तकलीफ है | भला बकरी को बकरी नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ? अब लालाजी को काटो तो खून नहीं | ठग समझ गएँ की लाला जाल में फंस चूका है | चौथा ठग आया और उसने भी वही बात कही जो उससे पहले के ठगों ने कही थी , साथ ही लालाजी से पूछा की उन्होंने यह बकरी कहाँ से खरीदी है ? लालाजी ने बता दिया | अब वह ठग बोला , ” श्रीमान जी ! इसमे आपका कोई दोष नहीं | जिस गांव से आपने यह बकरी खरीदी है , उस गांव के लोग तंत्र मंत्र जानते है | उनके पास जादू की एक लकड़ी है जिसे वे लोग क्रेताओं के सिर पर फिरा देते हैं | क्रेताओं को इस बात का पता भी नहीं चलता और उन्हें बकरी , गाय और गाय ऊंट नजर आने लगती है | अच्छा आपने इस बकरी को कितने रुपये में ख़रीदा ? लालाजी ने बता दिया | ठग बड़े जोर से चिल्लाया , ” घोर कलियुग है भाइयों ! देखो किसी ने ५० रुपये की बकरी लालाजी को ५०० रुपये में बेच दी और लालाजी भी इसे गाय समझ कर बड़े शान के साथ लिए जा रहे हैं |” लालाजी अब सम्मोहित हो चुके थे | ठगों ने एक प्रस्ताव रखा , ” मान्यवर ! हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते , हाँ , इतना अवश्य है की जिस बकरी को आपने गाय समझ कर ५०० रुपये में क्रय किया है , उसे हम अधिक से अधिक १०० रूपये में खरीद सकते हैं ” मरता क्या न करता ? लालाजी ने हिसाब लगाया …..५० रुपये की बकरी का यह भला आदमी १०० रूपये दे रहा है , कुल मिलाकर ५० रूपये का मुनाफा होगा | जो गया सो गया ५० रुपये नफे में अब इस बकरी को बेच देने में ही भलाई है , और यह सोचकर लालाजी ने ५०० रुपये की गाय ठगों को मात्र १०० रूपये में बेच दी | मनोविज्ञान की भाषा में इसे CONFORMITY EFFECT कहते हैं | भारत के लगभग प्रत्येक मनोविज्ञानशाला में प्रतिवर्ष इससे सम्बंधित प्रयोग होते रहते हैं और सभी का परिणाम एक जैसा ही होता है | बड़े से बड़ा आत्मविश्वासी भी सामाजिक प्रभाव के समक्ष घुटने टेक देता है | प्रभाव सब पर पडता है , मात्रा अवश्य ही अलग अलग होती है |
यह तब की बात है जब हमारा देश वैचारिक पक्षाघात का शिकार हो चूका था | आक्रांताओं ने इसे सम्मोहित कर रखा था | भारतीयों के मन में यह बात बैठा दी गई थी कि उनकी कोई जीवन पद्यति नहीं , उनका कोई व्यक्तित्व नहीं | वे काफिर हैं , वे मुशरिक हैं , वे हीदन हैं , वे पेगन हैं | भारत सपेरों का देश है | जादूगरों का देश है | असम में जावोगे तो वहां कि औरते तुम्हें मक्खी बना लेगी | तिब्बत में जावोगे तो लामाओं का बोझा ढोना होगा | समुद्र यात्रा करना महापाप है | भारत का सम्पूर्ण ज्ञान ब्रिटिश पुस्तकालय में रखे एक अलमारी से अधिक कुछ नहीं | बनारस ठगों कि राजधानी है | हरिद्वार में व्यभिचारी संतों का चोगा ओढकर कानून को धोखा देते हैं | शिवाजी एक लुटेरे थे | भारत में औरतों को जबरदस्ती आदमियों के साथ फूंक दिया जाता है | भारतीय अशिक्षित हैं | हिंदू जैसा कोई शब्द नहीं | भारतीयों की कोई राजनैतिक चेतना नहीं , उनकी कोई सामाजिक , आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान नहीं | भारतीय न तो विचारक हो सकते हैं और न ही दार्शनिक | यहाँ आडम्बर और झूठ का बोलबाला है | भारतीय एक अच्छा वकील , एक अच्छा राजनेता , एक अच्छा वैज्ञानिक , एक अच्छा खिलाडी और एक अच्छा सिपाही हो ही नहीं सकता | यह तो White Man’s Burden है | जो लोग बकरदाढ़ी रखते थे उनका सम्मान किया जाता था और शिखा धारण करने वालों का मखौल उडाया जाता था | लोग अपने आपको हिंदू कहने में शर्माने लगे | “” दासता में ही मुक्ति है और प्रभुता में दासत्व ” को अपना आदर्श मानने वाली हमारी सामाजिक व्यवस्था ने पहली बार राजनैतिक दासता का दंश झेला था | यह रामगुलाम वाली आध्यात्मिक दासता नहीं जिसमे एक ब्राम्हण तुलसीदास और एक शुद्र रैदास में राम का सबसे बड़ा गुलाम बनने की सात्विक स्पर्धा हो , यह तो आयातित निरंकुश राजसत्ता की मदांध पाशविक दासता थी एकदम से ”जाके मुख देखे दुःख उपजत , ताको करिबो पडो सलाम ” वाली दुर्दांत दासता |
ऐसे समय में १२ जनवरी सन १८६३ को बंगाल प्रान्त के कलकत्ता में एक संभ्रांत कायस्थ परिवार में बालक नरेन्द्रनाथ का जन्म होता है | सूर्य मकर राशि का संक्रमण कर रहे थे | एक नए युग का प्रादुर्भाव होना था | होनहार बिरवान के होत चीकने पात | यही बालक आगे चलकर भारतीय पुनर्जागरण का सबसे बड़ा उत्प्रेरक स्वामी विवेकानंद बनता है | जब हिंदू सिर झुकाकर इस तरह से अपना परिचय देते थे मानों कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया हो तब वैज्ञानिक समृद्धि के शिखर पर विराजमान अमेरिका में स्वामी विवेकानंद की सिंह गर्जना सुनाई पड़ती है गर्व से कहो की हम हिंदू है और सारा संसार मत्रमुग्ध सा स्वामीजी के इस कथन का अनुसमर्थन करता है | यह कथन किसी ऐरे गैरे नत्थुखैरे का नहीं डेविड ह्यूम , इम्मान्युअल कांट , फित्से , स्पिनोजा , हीगल , स्कोपेन्हावर , आगस्ट काम्टे , हरबर्ट स्पेंसर , जान स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन जैसे उद्भट पाश्चात्य विद्वानों और उनकी सम्पूर्ण कृतिओं को कंठस्थ कर लेने वाले अप्रतिम अध्येता स्वामी विवेकानंद का था |
उत्थान पतन सृष्टि का अपरिवर्तनीय नियम है | जो जन्म लेता है उसे मरना ही पड़ता है | संसार के सभी व्यक्तियों को सांसारिक कष्ट भोगने पड़ते हैं | स्वामी विवेकानंद को भी इन परिस्थितियों से दो चार होना पड़ा | समय ने उन्हें दाने दाने का मुहताज बना दिया | घर के बर्तन भांड सब कर्ज चुकाने में चले गए | आध्यात्मिक चेतना , भौतिक क्षुधा के सामने नतमस्तक होने ही वाली थी | विवेकानंद ने अपना संकट अपने गुरु के सामने रखा | रामकृष्ण परमहंस ने कहा जाओ माँ से अपनी व्यथा व्यक्त करो , मैं नहीं जाता | विवेकानंद तीन बार गए | तीनों बार उन्होंने ज्ञान , विवेक , प्रज्ञा , धृति ही माँगा | सूरदास कहू कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै | धन की याचना उनके कंठ से नहीं निकली | गुरु को अपनी ओर से कहना पड़ा …..जाओ , तुम्हे खाने और पहनने की कोई कमी नहीं होगी | किशोरावस्था में जिस ईश्वर के अस्तित्व को उन्होंने ख़ारिज कर दिया था , वही ईश्वर अब प्रतिपल छाये की भांति उनके साथ था | मनुष्यों को जिस प्रकार मनुष्य दिखाई पड़ते हैं , उनको आत्म्ब्र्म्ह दिखाई पडता था | मात्र उदर का ही पोषण उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था , उन्हें तो भारतीयों की खोई अस्मिता उन्हें लौटानी थी |
डॉ विलियम हस्ती ने लिखा ,” नरेंद्र वास्तव में एक प्रतिभाशाली बालक है | मैंने दूर दूर तक यात्रा की किन्तु उसके जैसी संभावनाओं और क्षमताओं वाला कोई लड़का जर्मन विश्वविद्यालयों के दर्शन विभागों में भी नहीं मिला ”
सन १८८८ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के स्वर्गवास के उपरांत स्वामी विवेकानंद युवा सन्यासी के वेश में भारत भ्रमण को निकल पड़े | करतल भिक्षा , तरुतल वासः का उद्देश्य लेकर पैदल ही उन्होंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया | बार बार उनके मन में एक ही विचार आता ….मुझे गुरुदेव ने निर्विकल्प समाधी के सुख से वंचित क्यों किया ? वह कौन सा कार्य है जो वह अज्ञात सत्ता मुझसे करवाना चाहती है ?
भारत भ्रमण के दौरान उन्हें विभिन्न प्रकार के अनुभव हुए | वाराणसी के दुर्गाकुंड नामक स्थान पर उन्हें बंदरों ने दौड़ा लिया | स्वामीजी सरपट भागे | पास ही एक अन्य तरुण सन्यासी साधनारत था | उसने चिल्ला कर कहा ….भागो मत , रुको और मुकाबला करो |नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः यह आत्मा बलहीनों के लिए नहीं है | उपनिषदों का यह घोष वाक्य मानों सजीव हो उठा | काशी से प्राप्त यह शिक्षा आजीवन उनके साथ रही |
फिर वह दिन भी आया जब पूरा विश्व वेदों , उपनिषदों , पुराणों , स्मृतियों और महाकाव्यों में वर्णित महान सत्य का साक्षात्कार करने को व्यग्र हो उठा ११ सितम्बर १८९३ शिकागो ( जहाँ पहले केवल एक जंगली प्याज शिकागो उगा करती थी ) के आर्ट इन्स्टिच्युट में भारत की सनातन मेधा स्वामी विवेकानन्द का आश्रय पाकर फूट पड़ी | श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ……हे विश्व के अमृत पुत्रों सुनों …या दूसरे शब्दों में मेरे अमेरिका निवासी भगिनी और भात्रिगन | इससे पहले के सारे वक्ता मलिन हो गए | स्वामीजी ने एक संक्षिप्त सा उद्बोधन दिया और सात हजार श्रोता मत्रमुग्ध होकर लगातार दो मिनट तक ताली ही बजाते रहें | मानों सरस्वती स्वयं पुरुष वेश धारण कर अपने दिव्य वीणा का वादन कर रही हों | आधुनिकता अकुर पाशविक स्पर्धा की चक्की में पिसते पश्चिमी जगत में सबको अपना मानने वाली दिव्यसत्ता का आध्यात्मिक महाविस्फोट हुआ था | ऐसा महान सन्देश अमेरिकियों ने पहले कभी नहीं सुना था | दूसरे दिन अमेरिका के समस्त समाचार पत्र स्वामी जी के भाषण से पटे पड़े थे |
New York Herald ने लिखा ,” Vivekanand is undoubtedly the greatest figure in the parliament of religions , After hearing him , we feel how foolish it is to send missionaries to this learned nation “
स्वामी विवेकानंद ने सम्पूर्ण अमेरिका और यूरोप का भ्रमण किया और | स्थान स्थान पर उनके प्रवचन आयोजित किये गए | पाश्चात्य जगत द्वारा भारत पर लगाया गया कलंक एक झटके में नेस्तनाबूद हो गया | हमारी सभ्यता रोम और यूनान की सभ्यता से भी अधिक प्राचीन है और अक्षुण्ण है ….इस तरह का भाव एक बार फिर से भारत भुवन में प्रसारित होने लगी |
यह बात कतिपय लोगों को अच्छी नहीं लगी है | भारत की कोई मूल सभ्यता नहीं , आर्य भी अन्यों की भांति एक आक्रांता थे | इस तरह का मिथ्या प्रचार अब भी बदस्तूर जारी है | हे विवेकानंद ! तुम कब आओगे ?शनिवार, 8 जनवरी 2011
सावधान अब मृत्यु निकट है
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
मंदिर जैसे श्राप हो गया,
ध्वज फहराना पाप हो गया |
” हर एक हिंदू आतंकी है ”
यह नारायण जाप हो गया |
आरक्षण की लौह श्रृंखला में बंदी संगम का तट है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
जिसने रक्त पिलाकर पाला,
देह जलाकर किया उजाला |
इंद्रप्रस्थ के सिंहासन ने
उसपर आज हलाहल डाला |
सीमा के इस ओर प्रलय को आमंत्रण गुपचुप, खटपट है|
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
सूरज की किरणों को गाली,
ग्रसने को आतुर है लाली
राहू केतु ने मुंह फैलाया
संग शक्तियां काली काली|
रोज नया नाटक रचता है, यह कैसा मायावी नट है ?
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
जमी हुई है तट पर काई,
तलछट में फैली चिकनाई|
हुआ प्रदूषित पूर्ण सरोवर,
पुण्य माघ की बेला आई |
चाहे जितना गंदला हो जल, डुबकी को आतुर जमघट है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
जनहठ पर नृपहठ है भारी,
निर्वाचित होते व्यापारी |
हुई निरर्थक राष्ट्र चेतना,
भूखी, नंगी जनता सारी |
पापगान में गम कान्हा का सामगान और वंशीवट है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
जिसने कूल्हों को मटकाया |
कोटि कोटि पण उसने पाया |
वही राजनेता है भारी -
जिसने जनता को भटकाया |
गुरुवार, 6 जनवरी 2011
कविताएँ रह गयी अधूरी
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |
कैसा शैशव और तरुणाई?
केवल सिसकी और रुलाई|
नियति नटी का नृत्य अनोखा
जब देखो आखें भर आयीं|
मस्त कोकिला भी रोती है जब पंचम स्वर में गाती है |
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |
मिटी नहीं हृदयों से दूरी,
कवितायें रह गयी अधूरी|
जाने कितना और है जाना?
यात्रा कब यह होगी पूरी?
संशयग्रस्त बना कर जीवन मृगतृष्णा छलती जाती है |
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |
पूरा दीपक, पूरी बाती,
तेल नहीं लेकिन किंचित भी |
बेकारी मजबूर बनाती,
अन्धकार का शाश्वत साथी |
तोड़ रहा दम इक दाने को पौरुष की चौड़ी छाती है |
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |
तेरा तो प्रभु सोने का है,
मेरी तो माटी की मूरत|
वंदनीय है तेरा आनन,
मेरी बचकानी सी सूरत |
चिंदी में लिपटे लोगों की छाया भी मुंह बिचकाती है|
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |
कहते हैं संघर्ष हमेशा
सत्य सदा विजयी होता है |
जिसमे साहस है वह जीता |
केवल कायर ही रोता है |
यम नियमों के बंधन वाली यह छलना छलती जाती है |
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |
शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010
नमन हमारा
लाली छाये दशों दिशा में, जगमग जगमग हो जग सारा |
नवल वर्ष के नव प्रभात को विनत हमारी, नमन हमारा ||
शीतल, मलय सुवासित नंदन वन सा मह मह महके भारत |
कोकिल सा कूके इस जग में खग सा चह चह चहके भारत |
फटे शत्रुओं पर बन घातक ज्वाला भक् भक् भभके भारत |
शौर्य, तेज का तीक्ष्ण हुताशन बनकर दह दह दहके भारत |
तड तड टूटे सारे बंधन जीर्ण शीर्ण हो सारी कारा |
नवल वर्ष के नव प्रभात को विनत हमारी नमन हमारा ||
शेष फिर कभी वंदे भारत मातरम
मनोज कुमार सिंह मयंक
एक हिंदू आतंकवादी
मंगलवार, 21 दिसंबर 2010
वन्देमातरम कहना होगा
यह वंदेमातरम सम्प्रदाय का परिचायक है,मान लिया॥
आओ,मै तुम्हे बताता हूँ,इस वंदेमातरम की सत्ता।
तुमको उसका भी ज्ञान नहीँ जो जान चुका पत्ता-पत्ता॥
जो ज्ञानशून्य भू पर बरसी,बन,शून्य-ज्ञान की रसधारा।
दशमलव दिया इसने तब,जब था बेसुध भूमण्डल सारा॥
जब तुमलोगोँ के पुरखोँ को ईमान का था कुछ भान नहीँ।
कच्चा ही बोटी खाते थे, वस्त्रोँ का भी था ज्ञान नहीँ।
जंगल-जंगल मेँ पत्थर ले, नंगे-अधनंगे फिरते थे।
सर्दी-गर्मी-वर्षा अपने उघरे तन पर ही सहते थे।।
तब वंदेमातरम के साधक, माँ चामुण्डा के आराधक।
अज्ञान तिमिर का जो नाशक,था ढूँढ़ लिया हमने पावक॥
मलमल के छोटे टुकड़े से, उन्मत्त गजोँ को बाँध दिया।
दुःशासन का पौरुष हारा, पट से पाञ्चाली लाद दिया॥
जब वंदेमातरम संस्कृति को था किसी सर्प ने ललकारा।
तब लगा अचानक ही चढ़ने जनमेजय के मख का पारा॥
यह वंदेमातरम उसी शक्तिशाली युग की शुभ गाथा है।
जिसके आगे भू के सारे नर का झुक जाता माथा है॥
इसका प्रथमाक्षर चार वेद,द्वितीयाक्षर देता दया,दान।
तृतीयाक्षर माँ के चरणोँ मेँ,अर्पित ऋषियोँ का तप महान॥
पञ्चम अक्षर रणभेरी है,अंतिम मारु का मृत्युनाद।
चिर उत्कीलित यह मंत्र मानवोँ की स्वतंत्रता का निनाद॥
जो स्वतंत्रता का चरम मंत्र,जो दीवानोँ की गायत्री।
जो महाकाल की परिभाषा,भारत माँ की जीवनपत्री॥
जो बलिदानोँ का प्रेरक है,जो कालकूट की प्याली है।
जो है पौरुष का बीजमंत्र, जिसकी देवी माँ काली है॥
जो पृथ्वीराज का क्षमादान, गोरी का खण्डित हुआ मान।
जो जौहर की हर ज्वाला है, जो आत्मत्याग की हाला है॥
जिसमेँ ऋषियोँ की वाणी है, जो शुभदा है, कल्याणी है।
जो राष्ट्र-गगन का इन्द्रधनुष,उच्चारण मंगलकारी है॥
जिसमेँ दधीचि की हड्डी है, हाँ,हाँ जिसमेँ खुद चण्डी है।
जो पुरुषोत्तम का तीर धनुष,हाँ जिसमेँ हैँ नल,नील,नहुष॥
राणा-प्रताप का भाला है, विष कालकूट ने डाला है।
जो प्रलय मचाने वाला है,इसको विद्युत ने पाला है॥
इसमेँ शंकर का दर्शन है, जिसका भावार्थ समर्पण है।
जो बजरंगी का ब्रम्हचर्य, जो आत्मबोध का दर्पण है॥
यह वागीश्वरी का सौम्य तेज,अम्बर से झरता झर-झर है।
यह चामुण्डा के हाँथो मेँ शोणित छलकाता खप्पर है॥
जो मनुपुत्रोँ के लिये स्वर्ग, सर्वात्मवाद की धुरी रही।
जिसमेँ देवोँ की दैविकता अमृत बरसाती सदा रही॥
उस ऐक्य मंत्र के ताने को,तेजस्वी गैरिक बाने को।
उर्जा की दाहक गर्मी को, उस मानवता को,नरमी को॥
गंगाधर के शिव स्वपनोँ मेँ, नेताजी के बलि भवनोँ मेँ।
गौतम के मंगल कथनोँ मेँ, मीरा के सुन्दर भजनोँ मेँ॥
यह किसने आग लगाया है, जग को उल्टा बतलाया है॥
यह किसने आग लगाया है, जग को उल्टा बतलाया है॥
यह वंदेमातरम शब्द नहीँ यह भारत माँ की पूजा है।
माँ के माथे की बिँदिया हैश्रृंगार न कोई दूजा है॥
इसमेँ तलवार चमकती है मर्दानी रानी झाँसी की।
इसमेँ बलिदान मचलता है,दिखती हैँ गाँठे फाँसी की॥
मंगल पाण्डे की यादेँ हैँ।शिवराज नृपति की साँसेँ हैँ॥
यह बिस्मिल के भगवान वेद।यह लौह पुरुष का रक्त स्वेद॥
यह भगत सिँह की धड़कन है।आजाद भुजा की फड़कन है॥
यह गंगाधर की गीता है, चित्तू पाण्डे सा चीता है।
जलियावाला की साखी है।हुमायूँ बाहु की राखी है॥
यह मदनलाल की गोली है।मस्तानी ब्रज की होली है॥
यह चार दिनोँ के जीवन मेँ चिर सत्य,सनातन यौवन है।
यह बलिदानोँ की परम्परा अठ्ठारह सौ सत्तावन है॥
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसा के बन्दे सब इसको गाते हैँ।
सब इसे सलामी देते हैँ,इसको सुन सब हर्षाते हैँ॥
लेकिन कुछ राष्ट्रद्रोहियोँ ने है इसका भी अपमान किया।
इस राष्ट्रमंत्र को इन लोगोँ ने सम्प्रदाय का नाम दिया॥
जाओ,जाकर पैगम्बर से पूछो तो क्या बतलाते हैँ?
वे भी माता के पगतल मेँ जन्नत की छटा दिखाते हैँ।
यह देखो सूली पर चढ़कर क्या कहता मरियम का बेटा।
हे ईश्वर इनको क्षमा करो जो आज बने हैँ जननेता।।
ये नहीँ जानते इनकी यह गल्ती क्या रंग दिखलायेगी।
इस शक्तिमंत्र से वञ्चित हो माँ की ममता घुट जायेगी॥
गोविन्द सिँह भी चण्डी का पूजन करते मिर जायेँगे।
शिव पत्नी से वर लेकर ही संघर्ष कमल खिल पायेँगे।
फिर बोलो माँ की पूजा का यह मंत्र कम्यूनल कैसे है?
माँ को महान कहने वाला शुभ तंत्र कम्यूनल कैसे है?
तुम केवल झूठी बातोँ पर जनमानस को भड़काते हो।
गुण्डोँ के बल पर नायक बन केवल विद्वेष लुटाते हो॥
लेकिन,जब यह घट फूटेगा।जब कोप बवंडर छूटेगा॥
जब प्रलय नटी उठ नाचेगी।भारत की जनता जागेगी॥
तब देश मेँ यदि रहना होगा।तो वंदेमातरम कहना होगा॥
मनोज कुमार सिंह ‘मयंक’
बुधवार, 15 दिसंबर 2010
तुने शब्दों की मर्यादा भंग किया है
परमपिता की इस धरती पर सब कुछ संभव|
मूर्ख है जो कहता अस्तित्व तुम्हारा कम है|
अखिल विश्व संस्कृति तरु के जड़ में ही हम है|
हम हिंदू हैं जड़ चेतन को अपना माना|
माया ममता भस्म पहन केसरिया बाना |
हमीं सनातन सत्य सदा उद्घाटित करते |
हमीं विश्व में नयी चेतना का स्वर भरते |
हम आलोक पुत्र, अमर संस्कृति संवाहक
और सनातन धारा के हम ही तो वाहक |
हम तम के मस्तक पर चढ ब्रम्हास्त्र चलाते |
असुरों की छाती पर भगवा ध्वज फहराते |
हम आसेतु हिमालय भारत माँ के बेटे |
विधि के लिखे लेख अटल भी हमने मेटे |
खेल खेल में केहरी के दांतों को तोड़ा |
कालीदह को भी विषहीन बना कर छोड़ा |
देवतुल्य थे जो उन आर्यों के ही वंशज |
सबसे पहले हम आयें वसुधा के अग्रज |
और ब्र्म्ह्वादी तू क्या उल्टा कहता है |
महासती माता को ही कुल्टा कहता है |
हाय सनातन संस्कृति को शतखंड किया है |
तूने शब्दों की मर्यादा भंग किया है |
हम दिति और अदिति के सुत वसुधा के मुख हैं |
हमको पाकर इस दुनिया में सुख ही सुख है |
हमने कब मक्का को शोणित से नहलाया ?
अथवा जेरूसलम में भगवा ध्वज फहराया ?
हमने हृदयों को जीता जब भूमि जीतते थे वे |
महाबुद्ध को अपनाया जब अस्थि सींचते थे वे |
महावीर जिन कहलाये भावों को जीता |
युद्धभूमि में श्रीहरी के मुख निकली गीता |
वाही अमरवाणी गुरुओं के मुख से गूँजी |
वेदवाणी सारंग ग्रन्थ साहिब में कूकी |
सुनो वही हिंदू है जो प्रणवाक्षर जपता |
एक उसी सतनाम में हरपल रमता रहता |
अरिहंताणं णमों भाव में रत रहता है |
महाबुद्ध के श्रीचरणों में नत रहता है |
जो गीता, गंगा, गायत्री का साधक है |
कण कण शंकर, भारत माँ का आराधक है |
अग्निपंथ का अनुयायी जो सार भस्म करता है |
महानिशा में महाचिता पर महारास रचता है |
जो किन्नर के स्वर में गाता, तांडव भी करता है |
और अधर्मी के तन से तत्काल प्राण हरता है |
और धर्म भी कहाँ व्यक्तिगत, वही पद्यति अब भी |
हाँथ जोड़ पूजा करने की सतत संस्कृति अब भी |
क्या तुम गुदा द्वार से खाते, जब हम मुख से खाते ?
फिर बोलो इस दुनिया को तुम उल्टा क्यों बतलाते ?
कहाँ मुखौटा है हिंदू , किस मुख ने यह पहना है ?
यह मेरी भारत माता का सर्वोत्तम गहना है |
परमपिता ही पति जिसके, सिंदूर स्वर्ण हिंदू है |
भारत माता के मस्तक पर शोभित शुभ बिंदु है |
चलो मुखौटा ही अच्छा तुम सनातनी हम हिंदू |
तुममे हिंदू नहीं बिंदु पर हम तो शाश्वत सिंधु |
तुमने छोड़ा हम अपनाएं, हम छोड़े तुम गाओ |
आओ हम भी जूठा खाएं तुम भी जूठा खाओ |
मुझको जूठन भी मंगल पर तेरा तो नाजिस है |
समझ गया मैं भी असमझ अब, यह किसकी साजिश है |
किन्तु चक्र, दुष्चक्र, कुचक्रों की भी गति होती है |
भले कहें हम जड़ पत्थर को उनमे मति होती है |
इसीलिए तो अनगढ़ में भी प्रभु मूरत बन जाती |
तुम सूरा कहते ही रहते वह सूरत बन जाती |
अंतरग्रही प्राणियों ने जो ब्रम्ह वमन अपनाया |
वह सब कुछ भी तो मंगल है, धन्य देव की माया |
अभी शैशवावस्था में पर कलियुग तो कलियुग है |
पर असत्य के साथ विभव है, इसी बात का दुःख है |
करुणा, मैत्री और उपेक्षा, मुदिता मंगलकारी |
चलो बुद्ध की सहज मान्यता भी मैंने स्वीकारी |
वज्रपाणि श्रीमहाबुद्ध ने गीता ही तो गाया |
वेद लवेद बना कर छोड़ा, वेदों को अपनाया |
निर्ग्रंथों ने उसी मनीषा को स्वीकार किया है |
जिस पर दश के दश गुरुओं ने अपना प्राण दिया है |
भारत की यह चिंतन धारा अविछिन्न हिंदू है |
राजनीती के समरांगण में छिन्न भिन्न हिंदू है |
शून्यवाद, दशमलव दिया इस हेतु चलो गरियायें |
हमको गणित नहीं आता तो रोमन ही अपनाएं |
किन्तु जहाँ भी दीप जलेगा, ज्योतित तो हिंदू है |
यही नींव में और शिखर पर शोभित तो हिंदू है |
कोख लजाते धिक् धिक् भारत तुझको लाज नहीं आती ?
माँ को माँ कहने से हटते नहीं फट रही क्यों छाती ?
हिंदू ही सारा भारत, यह भारत ही हिंदू है |
मानवता का शीर्ष मुकुट मणि, इंदु शिखर इंदु है |
और व्युत्पति हिंदू की, शुभ हनद पारसी भाषा |
नष्ट हो गया, शेष किन्तु हम, खोज रहा है नासा |
हमने सेतु बनाकर बाँधा, देशों को जोड़ा है |
तू तो उनका अनुगामी, केवल जिसने तोड़ा है |
राणा, शिवा, दधिची, इंद्र और रामकृष्ण से ज्ञानी |
बाली, बलि, महाबली, बालक अभिमन्यु का पानी -
आज नीलाम हुआ देखो, कितने मुख बने मुखौटे ?
पिता हमारे पूर्वज अब भी हिंदू ही कहलाते |
उदधि दुह्नेवालों ने जो रत्न चतुर्दश पाया |
जिसको वेदों, उपनिषदों ने मुक्त कंठ से गाया |
राग, रागिनी, ताल, छंद, स्वर, अक्षर सब हिंदू है |
हम पर निर्भर है जग सारा, कब निर्भर हिंदू है ?
हम उदात शिव भाव से जगती से जो कुछ लेते हैं |
यग्य याग अपना सहस्त्र गुण कर इसको देते हैं |
अंधाधुंध विदोहन करने में रत दुनिया सारी |
प्रलयंकर से खेल रही बस प्रलय की है तैयारी|
प्रकृति प्रदूषित कर डाला है सारा मनुपुत्रों ने |
यही सिखाया है क्या हमको ब्रम्ह, धर्मसूत्रों ने ?
नहीं नहीं विघटन की बेला पर अब पुनः विचारें |
विकृति त्याग माँ को अपनाएं संस्कृति को स्वीकारें |
किन्तु विकृति को संस्कृति कहना कहाँ न्यायसंगत है ?
यहाँ वहाँ हर जगह भयावह दहशत ही दहशत है |
दहशतगर्दी के विरुद्ध अब शस्त्र उठाना होगा |
स्वयं विष्णु बनकर असुरों पर चक्र चलाना होगा |
और हमें यह उर्जा भी तो हिंदू शब्द ही देगा |
विधि आधारित इस जगती से न्यायोचित हक लेगा |
बौद्ध, जैन, सिख, शैव, शाक्त और सनातनी सब हिंदू |
एक एक जन हिंदू ही हैं बोलो कितने गिन दूँ ?
जहाँ कहीं भी न्याय हेतु प्रतिरोध दिखाई पडता |
मानवता के हेतु कहीं भी रोष दिखाई पडता |
और विवेक की अग्नि में जल कर क्षार व्यर्थ परिभाषा |
विश्व प्रेम की राह चले जन कहीं न तिरछी भाषा |
वहाँ वहाँ हिंदू स्थापित, हिंदू मानवता है |
इसे मिटा देने को तत्पर, आतुर दानवता है |
द्वैत मानता है जग तो अद्वैत मानते है हम |
तुमको भी तो कहाँ पृथक विद्वेष मानते हैं हम ?
हम तो बस उनके विरुद्ध जो द्वेष कर रहे हमसे |
ग्रन्थ ही जो उल्टा सिखलाता, व्यर्थ जल रहे हमसे |
और सुनो यह धर्म ही है जो एकसूत्र करता है |
कारण और निवारण कर्ता, भर्ता, संहर्ता है |
तुम भी इसे मानते हो पर स्वयं भ्रमित, भ्रम रचते |
मैं क्या तुम्हे फसाउंगा तुम खुद ही जाते फंसते |
ब्रम्ह निवारण है भ्रम का तुम भ्रम को देव बताते |
और समर्थन में जाने कितने यायावर आते |
जो बल को कमियां कहते, कमियों को बल बतलाते|
धूप-छाँव का खेल परस्पर, इंद्रजाल दिखलाते |
हा हा यह माया का दर्शन, जृम्भणअस्त्र स्वागत है |
इससे ऊपर भी कुछ है जो आगत और विगत है |
उसी तत्व की शपथ मुखौटा नहीं वदन है हिंदू |
स्थापित ब्रम्हांड जहाँ वह दिव्य सदन है हिंदू |
इससे रौरव भी रोता हर नरक त्रस्त रहता है |
इसका शरणागत हो करके स्वर्ग स्वस्थ रहता है |
हिंदू भाव धरी विरंचि जब चौदह तल रचता है |
उसी भाव को धार विष्णु रज गुण लेकर रमता है |
और भाव में कमी हुई तो रूद्र कुपित हो जाते |
इंद्र श्रृंखला तोड़ गगन में संवर्तक छा जाते |
मुझे करो मत विवश करूँ मैं आवाहन रुद्रों का |
नंदिकेश, शिव, वीरेश्वर का अनबंगी क्रुद्धों का |
कृत्या इसके पास भयावह दिवारात्रि रहती है |
इसका इंगित पाकर सोती इंगित पा जगती है |
यह अथर्व ब्रम्हास्त्र भूर्भुवः स्वः में प्रलय मचेगा |
डामर के हांथों में डमरू, डिंडिम नाद करेगा |
फिर मत कहना हिंदू सर्वदा आतंकी होते है |
मुझे सांत्वना दो लोगों अब देखो हम रोते हैं |
प्रतिरक्षा की तैयारी करना कुछ गलत नहीं है |
सुन लो जो सामर्थ्यवान है, प्रतिपल वही सही है |
इसीलिए श्री राम कालिका की पूजा करते हैं |
धनुष बाण लेकर हांथों में क्रीं काली कहते हैं |
वन्देमातरम इसका बोधक क्रीं काली फट स्वाहा |
किन्तु शक्तिमानों ने भी कब संस्कृति ग्रसना चाहा |
आज इसे ग्रसने की कोशिश करते इसके सुत हैं |
बुत से नफरत करने वाले मंदिर में कुछ बुत है |
इन्ही बुतों को खंडित करने दयानंद आये थे |
इन्हीं के लिए पुनर्जागरण में माँ ने जाए थे |
किन्तु किसी ने भी तो इसको नहीं मुखौटा बोला |
गंगा माँ की जलधारा में नहीं जहर था घोला |
आज हुआ जो पाप भयानक तुमसे अनजाने में |
शायद मैं भी इसका भागी हूँ किंचित माने में |
अगर तुम्हे कुछ कहना ही था मुझको बोला होता |
एक मंच क्या तेरी बलि मैं यह जग ही तज देता |
किन्तु सतत जीवन पद्यति को तूने गाली दी है |
कह डालो जो भी कहना है अब भी अगर कमी है |
चलो तुम्हारे ही स्वर में कुछ और कह रहा हूँ मैं |
कवितायें खुद ही बहती तुम कहो रच रहा हूँ मैं |
और तुम्हारे स्वर में हिंदू आतंकी, पापी है |
जब देखो उत्पात मचाने वाला अपराधी है |
भ्रष्ट कर दिया इसने पावन पथ उस पैगम्बर का |
जो मरियम का पति जन्नत में, यीशु जिसके दर का |
इसके सारे संत सदा रमणी में ही रमते हैं |
झूठ बोलते हैं मर्यादा भंग किया करते हैं |
हर हिंदू के प्रति कुछ गाली क्रतिधार्मिता होती |
हिंदू पथ पर चल जन्नत में नहीं मिलेगा मोती |
इसके ठेकेदार चुनिन्दा, कुछेक संगठन ही हैं |
और इसे प्रोत्साहित करने के भी अपराधी हैं |
सदा मार खाना और पिटना नियति हिंदुओं का हो |
कभी फैलना नहीं, सिमटना नियति हिंदुओं का हो |
किन्तु हमारे मत में धर्मविरोधी कब हिंदू है ?
प्रगतिशीलता, नवाचार प्रतिरोधी कब हिंदू है ?
नहीं कभी संकीर्ण रहा अब भी उदार यह ही है |
रूढ़ी और पाखण्ड विरोधी नवाचार यह ही है |
इस उदारता का प्रतिफल भी इसने खूब चुकाया |
अपनी सब सीमायें खोईं टूटा फूटा पाया |
चलो मिला जो भी अच्छा है, वह भी टूट रहा है |
देखो कितना क्षेत्र हमारा हमसे छूट रहा है |
इस पर रुकने और विचार करने का समय नहीं है |
अब तो किंचित भी विलाप करने का समय नहीं है |
पांचजन्य के हांथो को गांडीव उठाना होगा |
अगर हमें जिन्दा रहना है उन्हें सुलाना होगा |
नहीं तो फिर आने वाली पीढियां हमें कोसेंगी |
नहीं सोचने को कुछ होगा जब भी वे सोचेंगी |
इसीलिए पुरखों की तुमको शपथ सुनो, अब जागो |
चाहे कोई कुछ भी बोले डटे रहो, मत भागो |
तुमको बहकाने को पग पग पर दानव मायावी |
किसकी ममता में खोए, क्षणभंगुर सब दुनियावी |
सुनो मोक्ष पाने का पथ बस शरशय्या पर सोना |
अगर नहीं इसको मानोगे, व्यर्थ पड़ेगा खोना |
यह दुर्लभ मानव तन केवल कुरुक्षेत्र ही तो है |
और तुम्हारी कीर्ति रश्मियाँ यत्र तत्र ही तो है |
चलो, उठो, लपको सूरज को यह मीठा फल तेरा |
तुमको भडकाने का किंचित नहीं स्वार्थ कुछ मेरा |
बस मैं यही कहूँगा अपनी ताकत को पहचानो |
बजरंगी के ब्रम्हचर्य हिंदू की ताकत जानो |
कितने जामवंत आयेंगे बोलो तुम्हे उठाने ?
कुम्भकर्ण बन कर सोये हो भेजूं किसे जगाने ?
पहचानों इन शब्दों में ही वेदमंत्र है प्राणी |
संसृति रवि किरणों ने पहले सुनी वेद की वाणी |
उसे सरल करने को उपनिषदों ने जोर लगाया |
व्यर्थ हुआ जब इतिहासों ने छंद बद्ध कर गाया |
महाकाव्य भी जब थक बैठे तुम्हे जागते मानव |
गुरुवाणी में गीता गूंजी, वही रूद्र का तांडव |
नेति नेति का अंत नहीं है कोई अंतिम भू पर |
ऐसा कोई शब्द नहीं जो नहीं गया हो छू कर |
तुम हो राम कृष्ण के वंशज, रोम रोम में रमता |
तुम ही उसको तज देते हो, वह तुमको कब तजता ?
जो तेरे भीतर बाहर है, उसको नमन हमारा |
ब्रम्ह कहे या ईश्वर बोले, एक वेद की धारा |
इसी सत्य की चिर शाश्वत धारा हिंदू है |
हमको तो प्राणों से भी प्यारा हिंदू है |