सोमवार, 26 मार्च 2012
अध्यापक पात्रता परीक्षा में गलत क्या है?
वास्तव में,इसके मूल में अंग्रेजों द्वारा स्थापित वह दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है,जिससे हम आज तक नहीं उबर पाए हैं|अंग्रेजों ने शिक्षा के क्षेत्र में अधोमुख निस्यन्दन की वह प्रक्रिया विकसित की जिसके तहत मिशनरी स्कूलों से शिक्षा प्राप्त व्यक्ति हमारी समग्र शिक्षा व्यवस्था का नियामक बन बैठा|शिक्षा में भारतीयता और राष्ट्रवाद के तत्वों को एक निहित उद्देश्य के चलते धीरे धीरे सीमित किया गया और आज वह पूरी तरह से विलुप्त हो गया है|हमारे शिक्षालयों में संसाधनों का भारी अभाव है और योग्य शिक्षकों की कमी है|हम योजना दर योजना मूल्य आधारित,गुणवत्तापरक और सामूहिक शिक्षा की बात करते तो हैं किन्तु जब इन्हें अमली जामा पहनाने का वक्त आता है तो हम बजट की कमी का रोना रोने लगते हैं|राज्य, केन्द्र पर दोषारोपण करता है और केन्द्र सरकार राज्यों को दोषी ठहराने लगती है|यह बात सर्वविदित है की जब तक विद्यालयों में योग्य शिक्षक नहीं होंगे,सर्व शिक्षा अभियान के मह्त्वाकांक्षी उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता और यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब हम यह मान कर चलते हैं की ६ से १४ वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए क्योंकि उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने १९९३ में यह स्पष्ट किया था की १४ साल तक के समस्त बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करना एक मौलिक अधिकार है यद्यपि यह राज्य पर निर्भर करता है की वह इस बाध्यकारी व्यवस्था को कैसे लागू करती है?
यह १८३५ में लार्ड मैकाले द्वारा स्थापित मात्र अंग्रेजी शिक्षण की वह व्यवस्था नहीं है जिसका एकमात्र उद्देश्य लिपिकों की एक फ़ौज खड़ी करना हो और जिसके द्वारा भारत सरकार अपने प्रशासनिक उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए मानव संसाधन विकसित करने के स्थान पर न्यूनतम साक्षरता हासिल करने के उद्देश्य तक ही सीमित रहे बल्कि अनिवार्य शिक्षा क़ानून का आशय ६ से १४ वर्ष की आयु वर्ग तक के बच्चों में उनके विकास क्रम के अनुसार उनके बौद्धिक,शारीरिक,मानसिक,नैतिक और वैज्ञानिक जिज्ञासाओं का सम्यक समाधान कर उनके अंदर एक वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि विकसित करना है और जब शिक्षा के क्षेत्र में इन दूरगामी उद्देश्यों की पूर्ति करना है तो योग्य शिक्षकों का होना अपरिहार्य है लिहाजा योग्य शिक्षकों के चयन का मानक मात्र प्रशिक्षण का प्रमाणपत्र पाना ही नहीं होना चाहिए|इन्हीं सब उद्देश्यों को केन्द्र में रखते हुए केन्द्र सरकार ने १७ अगस्त १९९५ को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का गठन किया|इससे पहले राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद के अंतर्गत अधीनस्थ के रूप में कार्य कर रही थी और १९७३ से लेकर १९९५ तक इसका कार्य मात्र राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद को विविध मसलों पर सलाह देने तक ही सीमित था|१९८६ के राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात का स्पष्ट रूप से अनुभव किया गया की विभिन्न बोर्डों में न सिर्फ योग्य अध्यापकों की भारी कमी है वरन उनके पाठ्यक्रमों में भी पर्याप्त भिन्नता है|देश के अनेक राज्यों में प्राथमिक शिक्षा का अधिकाँश भार इंटर उत्तीर्ण अथवा कहीं कहीं हाई स्कूल उत्तीर्ण ऐसे अप्रक्षित अध्यापक वहन कर रहे हैं, जिन्हें न तो बाल मनोविज्ञान की सम्यक जानकारी है और न ही वे शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले नवाचारों से परिचित हैं|
वर्तमान में भारत शिक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का मात्र ४.१ फीसदी व्यय कर रहा है जो आगे बढ़ कर लगभग ६ फीसदी होने का अनुमान है|इसका यह साफ़ अर्थ है, हमें बड़ी मात्रा में शिक्षक चाहिए और ऐसे शिक्षक चाहिए जो वैश्विक मानदंडों पर खरे उतरते हो|हम जानते हैं की शिक्षा के क्षेत्र में निर्मित पिछली समस्त योजनाएं नाकारा साबित हो चुकी हैं और यह स्थिति तब है जब केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ साथ हमारे देश को शिक्षित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं और वे हमारे देश को अकेले शिक्षा के मद में प्रतिवर्ष करोड़ो,अरबों रुपये अनुदान अथवा ऋण के रूप में उपलब्ध करवाती हैं|२००८-०९ के आंकड़े बताते हैं की प्राथमिक शिक्षा के शेत्र में समस्त भारत में प्रति ३२ विद्यार्थी पर १ शिक्षक उपलब्ध है, देश के १४६ जिले ऐसे हैं जहाँ ४० विद्यार्थियों पर १ शिक्षक उपलब्ध है और यदि इन आकडों में दूर दराज के ग्रामीण अंचलों को भी शामिल कर लिया जाए तो अनेक ऐसे विद्यालय हैं जहाँ १०० विद्यार्थियों पर मात्र एक शिक्षक की उपलब्धता है और वह भी अप्रशिक्षित होने के साथ ही प्राथमिक शिक्षा के लिए नितांत अयोग्य है|उत्तर प्रदेश के समस्त प्राथमिक विद्यालयों के १२.०८ प्रतिशत और बिहार के ११.९० प्रतिशत विद्यालयों में शिक्षक छात्र अनुपात १०० से भी ऊपर है|आंध्र प्रदेश,अरुणांचल,दिल्ली,हिमाचल,कर्नाटक,केरल,महाराष्ट्र जैसे १४ राज्य ऐसे हैं जहाँ १०० से ऊपर अनुपात वाले विद्यालय .५ प्रतिशत से भी कम हैं और उच्च साक्षरता दर के रूप में इनका परिणाम हमारे सामने है|उत्तर प्रदेश और बिहार में प्राथमिक शिक्षा बस राम भरोसे ही चल रही है क्योंकि इन दो राज्यों में प्राथमिक शिक्षा का सम्पूर्ण राजनीतिकरण हो चूका है|राज्य के परिषदीय विद्यालयों में ग्राम प्रधानों और सभासदों का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है क्योंकि इंटर अथवा स्नातक शिक्षा मित्र ग्राम प्रधानों तथा सभासदों द्वारा अनुचित तरीके से चुने जाते हैं और इनके संपर्क बेसिक शिक्षा अधिकारी तक से होने के कारण मिड डे मील योजना में भारी उलट फेर करते हुए पाए जाते हैं|
आज स्थिति यह है की पूरे देश में केवल नाम मात्र की शिक्षा दी जा रही है|वास्तविकता यह है की भारत में शिक्षा को मटियामेट करने का कार्य तब से प्रारम्भ हुआ जब से प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में संविदा के आधार पर उन लोगों को शिक्षक बना कर नियुक्त किया जाने लगा जो खुद भी इंटर पास नहीं कर सके थे|उदहारण के लिए पश्चिम बंगाल और असं जैसे राज्यों में कोई भी कक्षा १० उत्तीर्ण व्यक्ति बिना किसी प्रशिक्षण के प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापन का कार्य कर सकता है|फलस्वरूप,आकडें बताते हैं की आज भी हमारे देश के विद्यालयों में लगभग ६ लाख शिक्षक ऐसे हैं जिनमें न्यूनतम शैक्षिक अभिरुचि ही नहीं है|जो या तो अयोग्य है अथवा अप्रशिक्षित हैं|
इन्ही सब समस्यायों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने राष्ट्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा का विचार किया और २०११ में प्रथम अध्यापक पात्रता परीक्षा आयोजित की|इस परीक्षा को अध्यापक चयन हेतु बाध्यकारी बनाते हुए यह प्रावधान किया गया की उक्त परीक्षा में न्यूनतम ६० प्रतिशत अंक अर्जित करना अनिवार्य होगा और केन्द्र सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त निजी संस्थानों में भी शिक्षक चयन हेतु इसे आधार बनाया जाना चाहिए|जुलाई २०११ में आयोजित प्रथम पात्रता परीक्षा में लगभग ७ लाख १० हजार अभ्यर्थी सम्मिलित हुए जिनमे से महज ९७,९१९ अभ्यर्थी ही इस परीक्षा में सफल हो सके शेष ८६ प्रतिशत अभ्यर्थी असफल हुए और उन्होंने सम्पूर्ण परीक्षा प्रक्रिया का ही आलोचना करना प्रारम्भ कर दिया|चूँकि रिक्तियों के सापेक्ष सफल होने वाले अभ्यर्थियों की तादाद कम थी अतः यह प्रावधान भी किया गया की राज्य सरकार चाहे तो वह अलग से प्रदेश स्तर पर अध्यापक पात्रता परीक्षा आयोजित कर सकती है किन्तु आगे से अध्यापको के चयन का आधार केवल पात्रता परीक्षा ही होगी|प्रारम्भ में कोई भी राज्य राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की इस अवधारणा से सहमत नहीं हुआ और उत्तर प्रदेश में तो इससे मुक्ति पाने के लिए अनेक बार परिषद के मसौदे को ठुकराने की चेष्टा की गयी किन्तु देश हित में परिषद के अड़ियल रवैये के चलते सरकार ने घुटने टेके और आनन फानन में उत्तर प्रदेश अध्यापक पात्रता परीक्षा आयोजित की गयी|प्रश्न पत्र का स्वरुप सरलतम रखा गया ताकि अधिक से अधिक लोग इस परीक्षा को पास कर सके और प्रदेश में अनुमानित १ लाख ९० हजार रिक्तियों को आसानी से भरा जा सके| प्रश्न पत्र में लगभग ९० फीसदी प्रश्न शिक्षा मित्रों को प्रशिक्षण हेतु दिए गए अभ्यास पुस्तिकाओं से ही पूछे गए ताकि शिक्षा मित्र भी इसे आसानी से पास कर सके|इसके बावजूद लगभग ५७ प्रतिशत छात्र अनुतीर्ण हुए और इससे मुक्ति हेतु अदालत का दरवाजा खटखटाने लगे|माननीय उच्च न्यायालय ने भी योग्यता के मूल्यांकन की इस प्रणाली में आस्था व्यक्त की और अध्यापक पात्रता परीक्षा के विरुद्ध लंबित तमाम याचिकाओं को प्रथम दृष्टया ही निरस्त कर दिया|अब न्यायालय में पात्रता परीक्षा के विरुद्ध कोई भी दमदार याचिका नहीं है लेकिन पात्रता परीक्षा को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है|
इस विवाद के केन्द्र में पात्रता परीक्षा के आधार पर ७२,८२५ रिक्तियों के भरे जाने हेतु बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा प्रकाशित विज्ञप्ति है|यादव कपिल देव लालबहादुर और राज्य तथा अन्य द्वारा उच्च न्यायालय में दायर याचिका ने पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को आंदोलित कर दिया है|इस याचिका में पात्रता परीक्षा को नहीं बल्कि बेसिक शिक्षा विभाग को कटघरे में खड़ा किया गया है|मामला यह है की बेसिक शिक्षा अधिनियम १९७३ के अनुसार प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में चयन हेतु नियुक्ति प्राधिकारी बेसिक शिक्षा अधिकारी होगा और इस बार के विज्ञापन में इस परम्परा को तोडा गया है|स्पष्ट है की याचिका तकनिकी रूप से समस्त प्रक्रिया को उलझाने के निमित्त लायी गयी है और इस याचिका के पीछे संविधान की आंशिक शक्ति भी नहीं है बल्कि इस एक याचिका के कारण पूरे प्रदेश में शिक्षा के अधिकार अधिनियम का खुल्लम खुल्ला मखौल उडाया जा रहा है और देश का एक अदना सा नागरिक भी इस बात को स्पष्ट रूप से समझता है की न्यायालय मूल अधिकारों का सबसे बड़ा संरक्षक है|अतः,मेरा आंकलन है की माननीय उच्च न्यायालय को इस याचिका को निरस्त कर देना चाहिए और उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के पीछे विधि की शक्ति विद्यमान होने के कारण ऐसा होगा भी|फिर भी इस याचिका ने राज्य में नियुक्तियों के भविष्य को प्रभावित किया है और नियुक्तियों में जितना ही देर होता जा रहा है उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के मन में उतना ही आक्रोश भरता जा रहा है|अकादमिक में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले किन्तु पात्रता परीक्षा में फिसड्डी अभ्यर्थी टीईटी प्राप्तांकों को चयन का आधार बनाये जाने के विरुद्ध हैं किन्तु विविध बोर्डों के मध्य असमानता वाली कसौटी पर खरे न उतरने के कारण राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद भी उनके मांगों और प्रस्तावों को गंभीरता से नहीं ले रहा है|बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकाँश अधिकारी और लगभग ९० फीसदी ब्यूरोक्रेसी टीईटी प्राप्तांकों को चयन का आधार बनाये जाने को न्यायोचित मानती है और शिक्षा के अन्तराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के लिए यह जरूरी भी है|जिस प्रकार एक अयोग्य माली पानी और खाद के प्रयोग से अनभिग्य होने के कारण पूरे बगिया को उजाड कर रख देने का प्रधान कारण बनता है ठीक उसी प्रकार एक अयोग्य शिक्षक समस्त राष्ट्र को उजाड सकता है|अध्यापक पात्रता परीक्षा दूध में से मक्खन निकालने की प्रक्रिया है अतः इसके आधार पर चयन पूरी तरह न्यायसम्मत है और जिस प्रकार ६ से १४ वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा एक मौलिक अधिकार है ठीक उसी प्रकार योग्य शिक्षक द्वारा शिक्षा ग्रहण करना भी उनका मौलिक अधिकार होना चाहिए क्योंकि संविधान द्वारा अनुच्छेद २१ में दिया गया जीवन रक्षा का अधिकार तब तक व्यर्थ है जब तक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक उपकरणों का भी प्रबंध नहीं कर दिया जाता|शिक्षा, जीवन रक्षा के अधिकार का एक अनिवार्य उपकरण है और इस उपकरण का उचित समय पर उचित प्रयोग एक योग्य अध्यापक ही बता सकता है|
शुक्रवार, 22 जुलाई 2011
चंद सवालात
कभी सत्य पर चला नहीं जो सत्याग्रह का नाम लिया||
अब बसंत के गीत सुनाना पौरुष को मंजूर नहीं|
माँगे सुनी हुई हाय, अब इज्जत है सिन्दूर नहीं||
श्रृंगार आज अस्पृश्य हुआ, नंगापन पूजा जाता है|
सौ सौ मछली खाकर बगुला, बगुला भगत कहाता है||
कोई कहता ओसामा जी और कोई ओबामा जी|
लोकतंत्र के बाजारों में बिकती है सब्जी भाजी||
आतंकी का चारण बनकर राजनीती नतमस्तक है|
कालनेमि के हांथो में भगवद्गीता की पुस्तक है||
रामचरितमानस को जो पानी पी पी गरियाता है|
इंटेलेक्चुअल उम्दा सबसे भारत में कहलाता है||
यहाँ खून सस्ता बिकता, आँखों का कोई मोल नहीं|
उनको ही पूजा जाता है जिनका कोई रोल नहीं||
कुछ अध्यात्मिक शब्दों को जागीर बना कर बैठे हैं|
सत्य, अहिंसा सोने की जंजीर बना कर बैठे हैं||
उलटी सीधी परिभाषा गढ़ने वाला यह खादी है|
प्रश्नचिंह पर प्रश्न उठता हूँ बोलो आजादी है?
क्यों गाँधी का ग्रहण लगा है नेताजी के सपनों में?
सावरकर, आजाद, तिलक और मालवीय से अपनों में||
सूत कातने से शोषण से मुक्ति नहीं मिल सकती है|
भ्रामक प्रचार करने वालों यूँ नहीं दासता मिटती है||
यूँ ही अनुनय करने से, हाँ, कोई अधिकार नहीं देता|
फूल नहीं देता है जो सुन लो तलवार नहीं देता||
सावरकर, नेताजी जैसों ने जब खून बहाया है|
महाकाल के जबड़े से फलरूप आजादी पाया है||
और उसका सौदा करने वालों ने उसको काट दिया|
हाय हमारी भारत माता टुकड़े टुकड़े बाँट दिया||
हर टुकड़े पर अलग अलग टुकड़े की मांग उठाते हैं|
खंडित, खंड खंड करते हम खुद से बटते जाते हैं||
गैर कोई आता भारत का अधिनायक बन जाता है|
जन गण मन अधिनायक कह कर भारत शीश झुकता है||
पोप मरे तो मरे हमारा परचम क्यों झुक जाता है?
एक विदेशी के मरने पर भारत शोक मनाता है||
क्यों अब भी भारत माता भारत में क्रंदन करती हैं?
एक भिखारिन बनी हुई सबका अभिनन्दन करती हैं||
चीन सुरक्षा परिषद में हमको आँखे दिखलाता है|
ताल ठोंक कर पाक हमारी सीमा में घुस आता है||
कुछ आतंकी संप्रभुता को चिंदी चिंदी कर देते|
हम दानवी हितों की खातिर उनकी अगवानी करते||
क्यों प्रत्यर्पण पर एक छोटा देश हमें उलझाता है?
अन्तर्राष्ट्रीय विधि की धारा रोज हमें बतलाता है||
क्यों यासीन मालिक के पग पर नाक रगड़ता है भारत?
आखिर किससे भय है इसको, किससे डरता है भारत?
क्यों रोटी के टुकड़े पर हर चंद सियासत होता है?
भूखे नंगों का निर्वाचन में ही स्वागत होता है||
क्यों प्रतिभा पर आरक्षण है, महगाई बढती जाती|
इधर तिजोरी बढती जाती, उधर जान घटती जाती||
क्यों पौरुष प्रतिबंधित और नारीत्व कलंकित होता है?
भगवा पर लाठी बरसा कर संसद हर्षित होता है||
क्यों कलंक के कब्रगाह का ढहना निन्दित होता है?
रामलला पर शौचालय का मांग प्रासंगिक होता है?
क्यों भारत की ललनाएं शेखों की जीनत बनती हैं?
एक विदेशी वधु देश को रोज बेइज्जत करती है||
क्यों गांधी नेहरु की श्रापित छाया में हम रहते हैं?
विश्वमंच पर आदर के संग रोज निरादर सहते हैं||
वेश्याएं चड्ढी पर लक्ष्मी यंत्र बनाकर चलती हैं|
एक अजंता दिखा दिखा भारत को नंगा कहती हैं||
वीणावादिनी की काया पर भ्रष्ट तूलिका चलती है|
हम जिनको श्वेत वसन कहते यह उनको नंगा करती है||
क्यों भूखों को क्रास बांटने लोग यहाँ पर आते हैं?
पहले अल्लाह दे दे बाबा फिर हम पर गुर्राते हैं||
आखिर क्यों अनुदान हाजियों को मिलता हमको गोली?
इधर चिताएं जलती हैं और उधर निकलती है डोली||
वन्देमातरम विद्रोही को पद्मविभूषण मिलता है –
हमें बांटने का सपना जिनकी आँखों में पलता है?
डंकल की डुगडुगी बजाते नहीं अघाता है भारत|
उछल उछल कर हाइड एक्ट के लाभ गिनता है भारत||
भारत का निर्माण नरेगा और मनरेगा से होगा|
खेल, खिलाडी, अभिनेता या पापी नेता से होगा||
यह ऐसा निर्माण घूस संस्कृति की जय जैकारी है|
मक्कार नहीं भारत है पर लगता है कुछ मक्कारी है||
क्यों सिक्को पर अल्फांसो और क्रास दिखाई पडता है?
भ्रूणघातियों का पैशाचिक हास सुनाई पड़ता है||
क्यों घूस लेना और देना एक परम्परा सी लगती है?
मानवता दिक्भ्रमित सो रही और दानवता जगती है||
क्यों जीता भी खो देते, हारे की याद नहीं करते?
घात लगा कर जो बैठे उन पर प्रतिघात नहीं करते||
हिंसा का उत्तर प्रतिहिंसा, वाद का प्रतिवादी तेवर|
कौन शत्रु और कौन मित्र अब नहीं रहा कोई अंतर||
सात दशक होने को आये फिर भी सिसकी भरती है|
यह कैसी आजादी है जिसमे बस जान निकलती है?
और उफ़ भी कहने का मतलब एक कम्युनल होना है|
राजमुकुटधारी भारत का गिरवी रखते सोना है||
यहाँ नीति में भी अंतर हम दो का नारा लगता है|
और किसी को खुला छूट पैदा करने का मिलता है||
बस अब बहुत हुआ लोगों, जाने दो झांकी दिखलाई|
अपराध किया शायद मैंने यह देखों आँखे भर आई||
चंद सवालात
कभी सत्य पर चला नहीं जो सत्याग्रह का नाम लिया||
अब बसंत के गीत सुनाना पौरुष को मंजूर नहीं|
माँगे सुनी हुई हाय, अब इज्जत है सिन्दूर नहीं||
श्रृंगार आज अस्पृश्य हुआ, नंगापन पूजा जाता है|
सौ सौ मछली खाकर बगुला, बगुला भगत कहाता है||
कोई कहता ओसामा जी और कोई ओबामा जी|
लोकतंत्र के बाजारों में बिकती है सब्जी भाजी||
आतंकी का चारण बनकर राजनीती नतमस्तक है|
कालनेमि के हांथो में भगवद्गीता की पुस्तक है||
रामचरितमानस को जो पानी पी पी गरियाता है|
इंटेलेक्चुअल उम्दा सबसे भारत में कहलाता है||
यहाँ खून सस्ता बिकता, आँखों का कोई मोल नहीं|
उनको ही पूजा जाता है जिनका कोई रोल नहीं||
कुछ अध्यात्मिक शब्दों को जागीर बना कर बैठे हैं|
सत्य, अहिंसा सोने की जंजीर बना कर बैठे हैं||
उलटी सीधी परिभाषा गढ़ने वाला यह खादी है|
प्रश्नचिंह पर प्रश्न उठता हूँ बोलो आजादी है?
क्यों गाँधी का ग्रहण लगा है नेताजी के सपनों में?
सावरकर, आजाद, तिलक और मालवीय से अपनों में||
सूत कातने से शोषण से मुक्ति नहीं मिल सकती है|
भ्रामक प्रचार करने वालों यूँ नहीं दासता मिटती है||
यूँ ही अनुनय करने से, हाँ, कोई अधिकार नहीं देता|
फूल नहीं देता है जो सुन लो तलवार नहीं देता||
सावरकर, नेताजी जैसों ने जब खून बहाया है|
महाकाल के जबड़े से फलरूप आजादी पाया है||
और उसका सौदा करने वालों ने उसको काट दिया|
हाय हमारी भारत माता टुकड़े टुकड़े बाँट दिया||
हर टुकड़े पर अलग अलग टुकड़े की मांग उठाते हैं|
खंडित, खंड खंड करते हम खुद से बटते जाते हैं||
गैर कोई आता भारत का अधिनायक बन जाता है|
जन गण मन अधिनायक कह कर भारत शीश झुकता है||
पोप मरे तो मरे हमारा परचम क्यों झुक जाता है?
एक विदेशी के मरने पर भारत शोक मनाता है||
क्यों अब भी भारत माता भारत में क्रंदन करती हैं?
एक भिखारिन बनी हुई सबका अभिनन्दन करती हैं||
चीन सुरक्षा परिषद में हमको आँखे दिखलाता है|
ताल ठोंक कर पाक हमारी सीमा में घुस आता है||
कुछ आतंकी संप्रभुता को चिंदी चिंदी कर देते|
हम दानवी हितों की खातिर उनकी अगवानी करते||
क्यों प्रत्यर्पण पर एक छोटा देश हमें उलझाता है?
अन्तर्राष्ट्रीय विधि की धारा रोज हमें बतलाता है||
क्यों यासीन मालिक के पग पर नाक रगड़ता है भारत?
आखिर किससे भय है इसको, किससे डरता है भारत?
क्यों रोटी के टुकड़े पर हर चंद सियासत होता है?
भूखे नंगों का निर्वाचन में ही स्वागत होता है||
क्यों प्रतिभा पर आरक्षण है, महगाई बढती जाती|
इधर तिजोरी बढती जाती, उधर जान घटती जाती||
क्यों पौरुष प्रतिबंधित और नारीत्व कलंकित होता है?
भगवा पर लाठी बरसा कर संसद हर्षित होता है||
क्यों कलंक के कब्रगाह का ढहना निन्दित होता है?
रामलला पर शौचालय का मांग प्रासंगिक होता है?
क्यों भारत की ललनाएं शेखों की जीनत बनती हैं?
एक विदेशी वधु देश को रोज बेइज्जत करती है||
क्यों गांधी नेहरु की श्रापित छाया में हम रहते हैं?
विश्वमंच पर आदर के संग रोज निरादर सहते हैं||
वेश्याएं चड्ढी पर लक्ष्मी यंत्र बनाकर चलती हैं|
एक अजंता दिखा दिखा भारत को नंगा कहती हैं||
वीणावादिनी की काया पर भ्रष्ट तूलिका चलती है|
हम जिनको श्वेत वसन कहते यह उनको नंगा करती है||
क्यों भूखों को क्रास बांटने लोग यहाँ पर आते हैं?
पहले अल्लाह दे दे बाबा फिर हम पर गुर्राते हैं||
आखिर क्यों अनुदान हाजियों को मिलता हमको गोली?
इधर चिताएं जलती हैं और उधर निकलती है डोली||
वन्देमातरम विद्रोही को पद्मविभूषण मिलता है –
हमें बांटने का सपना जिनकी आँखों में पलता है?
डंकल की डुगडुगी बजाते नहीं अघाता है भारत|
उछल उछल कर हाइड एक्ट के लाभ गिनता है भारत||
भारत का निर्माण नरेगा और मनरेगा से होगा|
खेल, खिलाडी, अभिनेता या पापी नेता से होगा||
यह ऐसा निर्माण घूस संस्कृति की जय जैकारी है|
मक्कार नहीं भारत है पर लगता है कुछ मक्कारी है||
क्यों सिक्को पर अल्फांसो और क्रास दिखाई पडता है?
भ्रूणघातियों का पैशाचिक हास सुनाई पड़ता है||
क्यों घूस लेना और देना एक परम्परा सी लगती है?
मानवता दिक्भ्रमित सो रही और दानवता जगती है||
क्यों जीता भी खो देते, हारे की याद नहीं करते?
घात लगा कर जो बैठे उन पर प्रतिघात नहीं करते||
हिंसा का उत्तर प्रतिहिंसा, वाद का प्रतिवादी तेवर|
कौन शत्रु और कौन मित्र अब नहीं रहा कोई अंतर||
सात दशक होने को आये फिर भी सिसकी भरती है|
यह कैसी आजादी है जिसमे बस जान निकलती है?
और उफ़ भी कहने का मतलब एक कम्युनल होना है|
राजमुकुटधारी भारत का गिरवी रखते सोना है||
यहाँ नीति में भी अंतर हम दो का नारा लगता है|
और किसी को खुला छूट पैदा करने का मिलता है||
बस अब बहुत हुआ लोगों, जाने दो झांकी दिखलाई|
अपराध किया शायद मैंने यह देखों आँखे भर आई||
मंगलवार, 14 जून 2011
दिल्ली का कफन
किस ओर जीवन और जन होने लगा है?
ग्रीष्म मेँ बदहाल, वर्षा मेँ चुभन है।
चीखता, चिल्ला रहा मेरा वतन है।
किन शहीदोँ की शहादत का असर है?
अब कहाँ वैसी जवानी, बाँकपन है।
स्वर्ग से रवि का पतन होने लगा है।
किस ओर जीवन और जन होने लगा है?
लफ्ज क्या थे? आबरु का जोश ही था।
एक नगमा सुन जगत मदहोश ही था।
ख्याल था, ख्यालात मिलते थे सभी के।
जो रहा बाकी उसे अफसोस ही था।
किन दरख्तोँ को यहाँ बोने लगा है?
किस ओर जीवन और जन होने लगा है?
खो गया सब, अब यहाँ बाकी नहीँ है।
मयख्वार हैँ, मय है मगर साकी नहीँ है।
फिर विलायत से मँगाया हाँथ तूने।
पूर्वजोँ की देश मेँ थाती नहीँ है।
यह कौन दिल्ली का कफन ढोने लगा है?
किस ओर जीवन और जन होने लगा है?
बुधवार, 23 मार्च 2011
तुम हरामी नहीँ हो
तुम हरामी नहीँ हो
और हरामजादा भी नहीँ।
लेकिन,
जो कुछ भी तुम हो -
उसके लिए -
यह दोनोँ शब्द -
हरामी और हरामजादा -
बहुत छोटे हैँ।
क्योँकि -
हरामी और हरामजादे -
अपनी वल्दियत नहीँ जानते,
और तुमने,
अपनी माँ को -
योरप, अमेरिका, चीन और अरब की गलियोँ मेँ,
नीलाम कर दिया।
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मंगलवार, 11 जनवरी 2011
श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः
राष्ट्रीय युवा दिवस पर विशेष
एक बहुत पुरानी कथा है | आपने भी सुनी होगी | मैं एक बार फिर से दुहराता हूँ | किसी नगर में एक लालाजी रहते थे | अपने बुद्धि और चातुर्य के बल पर उन्होंने अथाह धनराशी संकलित कर लिया था | उपभोक्ता अधिकारों का तो उन्हें इतना भान था , जितना आधुनिक काल में कन्जूमर फोरम के अधिकारियों को भी न होगा | लालाजी जिस वस्तु को एक बार भी देख लेते थे और उसका मूल्य निर्धारित कर देते थे , फिर उससे टस मस होना मुमकिन ही नहीं था | बार्गेनिंग करने में उनका कोई जवाब ही नहीं था | तात्पर्य यह की कोई भी उन्हें ठग नहीं सकता था | कहते हैं की गुण छुपाये नहीं छुपता , लिहाजा उनके इस व्यवहार कुशलता और व्यापारिक अंतर्दृष्टि की हनक पुरे देश में फ़ैल गई | इस बात को चार ठगों ने भी सुना | ठग भी बड़े धुरंधर | ऐसा कोई सयाना नहीं जिसको इन्होने ठगा न हो | ठगों ने लालाजी को ठगने का संकल्प लिया |” क्रतुमय पुरुषः” अर्थात मनुष्य संकल्पमय है | लिहाजा ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो मनुष्य ठान ले और वह पूर्ण न हो सके | भाग्य ने ठगों को लालाजी को ठगने का अवसर भी प्रदान कर दिया |
लालाजी के मन में एक गाय खरीदने की इच्छा ने जन्म लिया | टेंगना गांव में एक पशु मेला आयोजित हुआ | लालाजी वहाँ गएँ और एक उत्तम नस्ल की गाय उन्होंने ५०० रूपये देकर खरीद लिया | गाय को लेकर वे अपने घर आने लगे | चरों ठगों ने अलग अलग लालाजी की गाय को बकरी कहना शुरू कर दिया | पहले तो लालाजी क्रोधित हुए और पहले ठग को डाट कर भगा भी दिया लेकिन फिर वाही बात दूसरे ठग ने भी कही | लालाजी को बहुत गुस्सा आया साथ ही सशंकित भी हुए और जब तीसरे ठग ने भी गाय को बकरी कहा तो लालाजी से नहीं रहा गया और उन्होंने पूछ ही लिया , ” भाई ! तुम्हे हुआ क्या है ? इतनी लंबी चौड़ी गाय को बकरी क्यों कह रहे हो ? ठग ने कहा , श्रीमान जी ! लगता है आपकी आँखों को कुछ तकलीफ है | भला बकरी को बकरी नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ? अब लालाजी को काटो तो खून नहीं | ठग समझ गएँ की लाला जाल में फंस चूका है | चौथा ठग आया और उसने भी वही बात कही जो उससे पहले के ठगों ने कही थी , साथ ही लालाजी से पूछा की उन्होंने यह बकरी कहाँ से खरीदी है ? लालाजी ने बता दिया | अब वह ठग बोला , ” श्रीमान जी ! इसमे आपका कोई दोष नहीं | जिस गांव से आपने यह बकरी खरीदी है , उस गांव के लोग तंत्र मंत्र जानते है | उनके पास जादू की एक लकड़ी है जिसे वे लोग क्रेताओं के सिर पर फिरा देते हैं | क्रेताओं को इस बात का पता भी नहीं चलता और उन्हें बकरी , गाय और गाय ऊंट नजर आने लगती है | अच्छा आपने इस बकरी को कितने रुपये में ख़रीदा ? लालाजी ने बता दिया | ठग बड़े जोर से चिल्लाया , ” घोर कलियुग है भाइयों ! देखो किसी ने ५० रुपये की बकरी लालाजी को ५०० रुपये में बेच दी और लालाजी भी इसे गाय समझ कर बड़े शान के साथ लिए जा रहे हैं |” लालाजी अब सम्मोहित हो चुके थे | ठगों ने एक प्रस्ताव रखा , ” मान्यवर ! हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते , हाँ , इतना अवश्य है की जिस बकरी को आपने गाय समझ कर ५०० रुपये में क्रय किया है , उसे हम अधिक से अधिक १०० रूपये में खरीद सकते हैं ” मरता क्या न करता ? लालाजी ने हिसाब लगाया …..५० रुपये की बकरी का यह भला आदमी १०० रूपये दे रहा है , कुल मिलाकर ५० रूपये का मुनाफा होगा | जो गया सो गया ५० रुपये नफे में अब इस बकरी को बेच देने में ही भलाई है , और यह सोचकर लालाजी ने ५०० रुपये की गाय ठगों को मात्र १०० रूपये में बेच दी | मनोविज्ञान की भाषा में इसे CONFORMITY EFFECT कहते हैं | भारत के लगभग प्रत्येक मनोविज्ञानशाला में प्रतिवर्ष इससे सम्बंधित प्रयोग होते रहते हैं और सभी का परिणाम एक जैसा ही होता है | बड़े से बड़ा आत्मविश्वासी भी सामाजिक प्रभाव के समक्ष घुटने टेक देता है | प्रभाव सब पर पडता है , मात्रा अवश्य ही अलग अलग होती है |
यह तब की बात है जब हमारा देश वैचारिक पक्षाघात का शिकार हो चूका था | आक्रांताओं ने इसे सम्मोहित कर रखा था | भारतीयों के मन में यह बात बैठा दी गई थी कि उनकी कोई जीवन पद्यति नहीं , उनका कोई व्यक्तित्व नहीं | वे काफिर हैं , वे मुशरिक हैं , वे हीदन हैं , वे पेगन हैं | भारत सपेरों का देश है | जादूगरों का देश है | असम में जावोगे तो वहां कि औरते तुम्हें मक्खी बना लेगी | तिब्बत में जावोगे तो लामाओं का बोझा ढोना होगा | समुद्र यात्रा करना महापाप है | भारत का सम्पूर्ण ज्ञान ब्रिटिश पुस्तकालय में रखे एक अलमारी से अधिक कुछ नहीं | बनारस ठगों कि राजधानी है | हरिद्वार में व्यभिचारी संतों का चोगा ओढकर कानून को धोखा देते हैं | शिवाजी एक लुटेरे थे | भारत में औरतों को जबरदस्ती आदमियों के साथ फूंक दिया जाता है | भारतीय अशिक्षित हैं | हिंदू जैसा कोई शब्द नहीं | भारतीयों की कोई राजनैतिक चेतना नहीं , उनकी कोई सामाजिक , आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान नहीं | भारतीय न तो विचारक हो सकते हैं और न ही दार्शनिक | यहाँ आडम्बर और झूठ का बोलबाला है | भारतीय एक अच्छा वकील , एक अच्छा राजनेता , एक अच्छा वैज्ञानिक , एक अच्छा खिलाडी और एक अच्छा सिपाही हो ही नहीं सकता | यह तो White Man’s Burden है | जो लोग बकरदाढ़ी रखते थे उनका सम्मान किया जाता था और शिखा धारण करने वालों का मखौल उडाया जाता था | लोग अपने आपको हिंदू कहने में शर्माने लगे | “” दासता में ही मुक्ति है और प्रभुता में दासत्व ” को अपना आदर्श मानने वाली हमारी सामाजिक व्यवस्था ने पहली बार राजनैतिक दासता का दंश झेला था | यह रामगुलाम वाली आध्यात्मिक दासता नहीं जिसमे एक ब्राम्हण तुलसीदास और एक शुद्र रैदास में राम का सबसे बड़ा गुलाम बनने की सात्विक स्पर्धा हो , यह तो आयातित निरंकुश राजसत्ता की मदांध पाशविक दासता थी एकदम से ”जाके मुख देखे दुःख उपजत , ताको करिबो पडो सलाम ” वाली दुर्दांत दासता |
ऐसे समय में १२ जनवरी सन १८६३ को बंगाल प्रान्त के कलकत्ता में एक संभ्रांत कायस्थ परिवार में बालक नरेन्द्रनाथ का जन्म होता है | सूर्य मकर राशि का संक्रमण कर रहे थे | एक नए युग का प्रादुर्भाव होना था | होनहार बिरवान के होत चीकने पात | यही बालक आगे चलकर भारतीय पुनर्जागरण का सबसे बड़ा उत्प्रेरक स्वामी विवेकानंद बनता है | जब हिंदू सिर झुकाकर इस तरह से अपना परिचय देते थे मानों कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया हो तब वैज्ञानिक समृद्धि के शिखर पर विराजमान अमेरिका में स्वामी विवेकानंद की सिंह गर्जना सुनाई पड़ती है गर्व से कहो की हम हिंदू है और सारा संसार मत्रमुग्ध सा स्वामीजी के इस कथन का अनुसमर्थन करता है | यह कथन किसी ऐरे गैरे नत्थुखैरे का नहीं डेविड ह्यूम , इम्मान्युअल कांट , फित्से , स्पिनोजा , हीगल , स्कोपेन्हावर , आगस्ट काम्टे , हरबर्ट स्पेंसर , जान स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन जैसे उद्भट पाश्चात्य विद्वानों और उनकी सम्पूर्ण कृतिओं को कंठस्थ कर लेने वाले अप्रतिम अध्येता स्वामी विवेकानंद का था |
उत्थान पतन सृष्टि का अपरिवर्तनीय नियम है | जो जन्म लेता है उसे मरना ही पड़ता है | संसार के सभी व्यक्तियों को सांसारिक कष्ट भोगने पड़ते हैं | स्वामी विवेकानंद को भी इन परिस्थितियों से दो चार होना पड़ा | समय ने उन्हें दाने दाने का मुहताज बना दिया | घर के बर्तन भांड सब कर्ज चुकाने में चले गए | आध्यात्मिक चेतना , भौतिक क्षुधा के सामने नतमस्तक होने ही वाली थी | विवेकानंद ने अपना संकट अपने गुरु के सामने रखा | रामकृष्ण परमहंस ने कहा जाओ माँ से अपनी व्यथा व्यक्त करो , मैं नहीं जाता | विवेकानंद तीन बार गए | तीनों बार उन्होंने ज्ञान , विवेक , प्रज्ञा , धृति ही माँगा | सूरदास कहू कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै | धन की याचना उनके कंठ से नहीं निकली | गुरु को अपनी ओर से कहना पड़ा …..जाओ , तुम्हे खाने और पहनने की कोई कमी नहीं होगी | किशोरावस्था में जिस ईश्वर के अस्तित्व को उन्होंने ख़ारिज कर दिया था , वही ईश्वर अब प्रतिपल छाये की भांति उनके साथ था | मनुष्यों को जिस प्रकार मनुष्य दिखाई पड़ते हैं , उनको आत्म्ब्र्म्ह दिखाई पडता था | मात्र उदर का ही पोषण उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था , उन्हें तो भारतीयों की खोई अस्मिता उन्हें लौटानी थी |
डॉ विलियम हस्ती ने लिखा ,” नरेंद्र वास्तव में एक प्रतिभाशाली बालक है | मैंने दूर दूर तक यात्रा की किन्तु उसके जैसी संभावनाओं और क्षमताओं वाला कोई लड़का जर्मन विश्वविद्यालयों के दर्शन विभागों में भी नहीं मिला ”
सन १८८८ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के स्वर्गवास के उपरांत स्वामी विवेकानंद युवा सन्यासी के वेश में भारत भ्रमण को निकल पड़े | करतल भिक्षा , तरुतल वासः का उद्देश्य लेकर पैदल ही उन्होंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया | बार बार उनके मन में एक ही विचार आता ….मुझे गुरुदेव ने निर्विकल्प समाधी के सुख से वंचित क्यों किया ? वह कौन सा कार्य है जो वह अज्ञात सत्ता मुझसे करवाना चाहती है ?
भारत भ्रमण के दौरान उन्हें विभिन्न प्रकार के अनुभव हुए | वाराणसी के दुर्गाकुंड नामक स्थान पर उन्हें बंदरों ने दौड़ा लिया | स्वामीजी सरपट भागे | पास ही एक अन्य तरुण सन्यासी साधनारत था | उसने चिल्ला कर कहा ….भागो मत , रुको और मुकाबला करो |नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः यह आत्मा बलहीनों के लिए नहीं है | उपनिषदों का यह घोष वाक्य मानों सजीव हो उठा | काशी से प्राप्त यह शिक्षा आजीवन उनके साथ रही |
फिर वह दिन भी आया जब पूरा विश्व वेदों , उपनिषदों , पुराणों , स्मृतियों और महाकाव्यों में वर्णित महान सत्य का साक्षात्कार करने को व्यग्र हो उठा ११ सितम्बर १८९३ शिकागो ( जहाँ पहले केवल एक जंगली प्याज शिकागो उगा करती थी ) के आर्ट इन्स्टिच्युट में भारत की सनातन मेधा स्वामी विवेकानन्द का आश्रय पाकर फूट पड़ी | श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ……हे विश्व के अमृत पुत्रों सुनों …या दूसरे शब्दों में मेरे अमेरिका निवासी भगिनी और भात्रिगन | इससे पहले के सारे वक्ता मलिन हो गए | स्वामीजी ने एक संक्षिप्त सा उद्बोधन दिया और सात हजार श्रोता मत्रमुग्ध होकर लगातार दो मिनट तक ताली ही बजाते रहें | मानों सरस्वती स्वयं पुरुष वेश धारण कर अपने दिव्य वीणा का वादन कर रही हों | आधुनिकता अकुर पाशविक स्पर्धा की चक्की में पिसते पश्चिमी जगत में सबको अपना मानने वाली दिव्यसत्ता का आध्यात्मिक महाविस्फोट हुआ था | ऐसा महान सन्देश अमेरिकियों ने पहले कभी नहीं सुना था | दूसरे दिन अमेरिका के समस्त समाचार पत्र स्वामी जी के भाषण से पटे पड़े थे |
New York Herald ने लिखा ,” Vivekanand is undoubtedly the greatest figure in the parliament of religions , After hearing him , we feel how foolish it is to send missionaries to this learned nation “
स्वामी विवेकानंद ने सम्पूर्ण अमेरिका और यूरोप का भ्रमण किया और | स्थान स्थान पर उनके प्रवचन आयोजित किये गए | पाश्चात्य जगत द्वारा भारत पर लगाया गया कलंक एक झटके में नेस्तनाबूद हो गया | हमारी सभ्यता रोम और यूनान की सभ्यता से भी अधिक प्राचीन है और अक्षुण्ण है ….इस तरह का भाव एक बार फिर से भारत भुवन में प्रसारित होने लगी |
यह बात कतिपय लोगों को अच्छी नहीं लगी है | भारत की कोई मूल सभ्यता नहीं , आर्य भी अन्यों की भांति एक आक्रांता थे | इस तरह का मिथ्या प्रचार अब भी बदस्तूर जारी है | हे विवेकानंद ! तुम कब आओगे ?शनिवार, 8 जनवरी 2011
सावधान अब मृत्यु निकट है
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
मंदिर जैसे श्राप हो गया,
ध्वज फहराना पाप हो गया |
” हर एक हिंदू आतंकी है ”
यह नारायण जाप हो गया |
आरक्षण की लौह श्रृंखला में बंदी संगम का तट है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
जिसने रक्त पिलाकर पाला,
देह जलाकर किया उजाला |
इंद्रप्रस्थ के सिंहासन ने
उसपर आज हलाहल डाला |
सीमा के इस ओर प्रलय को आमंत्रण गुपचुप, खटपट है|
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
सूरज की किरणों को गाली,
ग्रसने को आतुर है लाली
राहू केतु ने मुंह फैलाया
संग शक्तियां काली काली|
रोज नया नाटक रचता है, यह कैसा मायावी नट है ?
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
जमी हुई है तट पर काई,
तलछट में फैली चिकनाई|
हुआ प्रदूषित पूर्ण सरोवर,
पुण्य माघ की बेला आई |
चाहे जितना गंदला हो जल, डुबकी को आतुर जमघट है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
जनहठ पर नृपहठ है भारी,
निर्वाचित होते व्यापारी |
हुई निरर्थक राष्ट्र चेतना,
भूखी, नंगी जनता सारी |
पापगान में गम कान्हा का सामगान और वंशीवट है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |
जिसने कूल्हों को मटकाया |
कोटि कोटि पण उसने पाया |
वही राजनेता है भारी -
जिसने जनता को भटकाया |