बुधवार, 17 नवंबर 2010

प्रिय सू की बहन

प्रिय सू की बहन,
सादर वंदेमातरम।
आखिरकार उद्दण्ड जुंटा सरकार ने आपके सत्याग्रह के समक्ष घुटने टेकते हुए आपको मुक्त कर ही दिया और आप एक लंबे अंतराल के बाद पुनः अपने समर्थकोँ के मध्य हैँ।अपने देश मेँ लोकतंत्र की प्रतिष्ठा के लिए आपका त्रासदीपूर्ण संघर्ष युगोँ-युगोँ तक याद रखा जायेगा।’अबला केनो माँ एतो बले’।एक स्त्री होने के बावजूद जिस अदम्य दृढ़ता और पौरुष का प्रदर्शन आपने किया है,वह अनुकरणीय है और वैसा करना तो पुरुष देहधारी बड़े-बड़े दुर्दान्त महानुभावोँ के लिये भी दुर्लभ है।हाँ, सत्याग्रह का नाम देकर उस नाम पर ठगने वाले तो बहुत है किन्तु वास्तविक सत्याग्रह तो केवल आपने ही किया है, ऐसी मेरी मान्यता है।
1937 मेँ अप्रिल फूल के दिन यदि हम भाई बहन को मूर्ख बनाकर अलग न किया गया होता तो शायद आज हम और आप एक ही देश होते, किन्तु प्रारब्ध को यह मंजूर नहीँ था और अंग्रेजो की कुटिल चालोँ ने हमे अलग कर दिया।मुझे आज भी ‘मेरे पिया गये रंगून, किया है वहाँ से टेलीफून, तुम्हारी याद सताती है, जिया मेँ आग लगाती है’ वाला गाना जब भी याद आता है, तो यही लगता है कि जैसे रंगून हमारे ही देश का कोई शहर हो।मुझे यह भी याद आता है कि

सहस्त्राब्दियोँ पहले जब हमारा देश ‘सोने (एक धातु) की चिड़ियाँ’ कहा जाता था तो आपका भूभाग भी हमारा ही अंग हुआ करता था और आपके देश से लगायत थाइलैँड, लाओस तक को सुवर्णभूमि के नाम से जाना जाता था।तब लुटेरे नहीँ आये थे।हम अपने घरोँ मेँ ताला भी तो नहीँ लगाते थे।वह भी एक समय हुआ करता था, जब थेरवाद का शंख यहाँ फूँका जाता था और बिना एक क्षण का विलम्ब किये गूँज वहाँ सुनाई पड़ने लगती थी।आज भी ‘यमा जातदा, के रुप मेँ आपके देश मेँ रामायण ही तो पढ़ा जाता है।आज तो हमारे ही देश मेँ वेद का लबेद हो गया है।क्या इस बात से कोई इंकार कर सकता है कि दक्षिण भारतीय लिपि और पाली के सम्मिश्रण ने आपकी बामर भाषा को आकार दिया है।घृणित कम्यूनिष्टोँ के लिये तो यह भी संभव है।एक छोटे से पत्र मेँ समूची बातोँ को नहीँ रखा जा सकता।हाँ, इतना अवश्य है की आपकी मुक्ति भी मुझे भारतीय सत्ता हस्तांतरण की तरह आधी अधूरी ही दिखाई पड़ती है।
भारत स्वतंत्र हुआ, विभाजन के साथ, बिना अल्पसंख्यक समस्या का निस्तारण किये और आप की मुक्ति हुई तो श्रीहीन, शक्तिहीन बनाकर।ने विन ने यू नू का तख्ता पलट दिया, 3000 से अधिक क्रान्तिकारियोँ को गोलियोँ से भून दिया गया।
आप जब प्रचण्ड बहुमत से आईँ तो आपको नजरबन्द कर दिया गया और जब आपकी पार्टी ने चुनावोँ का बहिष्कार कर दिया तब उसकी मान्यता निरस्त कर, आपको मुक्त कर दिया गया।आज विश्व का प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति अधर्म के विरुद्ध युद्ध मेँ आपके साथ है किन्तु उनकी आवाज आप तक पहुँच ही नहीँ सकती।सैन्य तानाशाही लोकतंत्र का बाना ओढ़कर एक बार फिर से सत्तारुढ़ हो चुकी है और आपका पड़ोसी हमारा देश, विदेशनीति के मामले मेँ अपंग होकर गलत को सही और सही को गलत मानते हुए दिग्भ्रम का शिकार हो गया है।क्या करेँ?’महिमा घटी समुद्र की रावण बसा पड़ोस’ हम दोनो को एक ही पड़ोसी परेशान कर रहा है।आगे आप खुद ही समझदार हो।
ॐ मणिपद्मने हुं
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शनिवार, 13 नवंबर 2010

हंगामा है क्यों बरपा

बुधवार को भोपाल की किसी सभा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सर संघचालक माननीय श्री कुप्प सी सुदर्शन ने यूपीये अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लक्ष्य कर
दो तीन आरोप जड़े और पुरे देश में लाखों स्थानों पर उनका पुतला फूंक दिया गया| हमारे देश के माननीय सांसदों और सम्माननीय नेताओं ने उन्हें मानसिक रूप
से दिवालिया तक कह दिया|यह सब करते हुए ब्रिटिशकालीन पुरातत्व विभाग के गणमान्य संरक्षकों को यह भी विस्मृत हो गया की स्पेक्ट्रम घोटाले में आरोपित
अपने माननीय मंत्री का ये लोग कितनी बेशर्मी से बचाव कर रहे हैं? कांग्रेस के महासचिव और मिडिया प्रभारी जनार्दन द्विवेदी ने ”पुरातत्व संग्रहालय से निकले
इस शख्स के प्रति’ जो भाषा इस्तेमाल की उसके बारे में भारतीय जनता के मन में संघ अथवा भाजपा के प्रति कुछ धारणा बनी हो या न बनी हो कांग्रेस के बारे
में एक धारणा अवश्य बन गयी की कांग्रेस को चाहे जो कुछ भी बोलो या न बोलो सोनिया को अवश्य बख्श दो| स्पष्ट है की जम्हूरियत अथवा लोकतंत्र को कांग्रेस
के लोग सोनिया गाँधी के श्री चरणोँ मेँ समर्पित कर चुके हैँ और वे उनके बारे मेँ किसी भी टिप्पणी को न तो बर्दाश्त कर सकते हैँ और न ही टिप्पणीकार को अपना पक्ष रखने का कोई अवसर दे सकते हैँ।
संस्कृति और सभ्यता को अपने पैरोँ तले कुचल देने वाले गाँधी और नेहरु के मानस पुत्रोँ की भाषा शैली स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक क्या रही है ? यह सर्वविदित है।जब भरी आमसभा मेँ लोकतंत्र की निर्माता और निर्देशिका ने एक लोकतंत्रात्मक ढंग से चुने गये मुख्यमंत्री को मौत का सौदागर कह कर पुकारा था, तब यह कौन सी मर्यादित भाषा शैली थी? जब भरी आमसभा मेँ लोकतंत्र के पटकथा लेखक ने संघ और सीमी को एक ही तरह का आतंकवादी संगठन करार दिया था, तब वह कौन सी मर्यादित भाषाशैली थी? जब भरी आमसभा मेँ लोकतंत्र के अभिनेता ने देश के समस्त संसाधनोँ पर एक वर्ग विशेष का हक जताया था, तो वह कौन सी मर्यादित भाषाशैली थी? जब भरी आमसभा मेँ लोकतंत्र के विपणन – प्रभारी ने सभी हिन्दुओँ को बर्बर आतंकी कह कर पुकारा था और समग्र भगवा जीवन पद्धति को नृशंस हत्यारा कहा था, तो वह कौन सी मर्यादित भाषा शैली थी? जब आतंकी हमले के समय, पत्रकारोँ के सामने लोकतंत्र के शब्द शिल्पी प्रत्येक पाँच मिनट मेँ अपना सूट-बूट कस रहे थे, तो वह कौन सा मर्यादित आचरण था? जब भरी आमसभा मेँ लोकतंत्र के अल्पसंख्यक चरित्र ने हेमंत करकरे की शहादत को हिन्दू आतंकवादियोँ का कृत्य बताया था, तो वह कौन सी मर्यादित भाषा थी? जब पहले ही आम चुनाव मेँ गली – गली मेँ ‘गाँधी के हत्यारोँ को वोट देना पाप है’ जैसे आधारहीन नारे लगाये जाते थे, तो वह कौन सा मर्यादित आचरण था? जब हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय सम्प्रभुता को ताक पर रखकर, भारत माता के ही एक हिस्से को लक्ष्य करते हुये ‘जिस जमीन पर घास का एक टुकड़ा नहीँ उगता, उसके बारे मेँ क्योँ चर्चा की जाय’ जैसा वाक्य बोला था, तो वह कौन सा मर्यादित आचरण था? जब बिना किसी ठोस कारण के मात्र राजनैतिक प्रतिद्वन्दिता के वशीभूत होकर राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राष्ट्रीय आपातकाल ठोँक दिया गया था, तो यह कौन सा मर्यादित कदम था? जब शहीदोँ की शहादत को भूलकर दिग्गी राजा आजमगढ़ मेँ घड़ियाली आँसू बहा रहे थे और मगरमच्छोँ के आँसू पोँछ रहे थे, तो यह कौन सा मर्यादित आचरण था? जब हमारे देश की प्रभुसत्ता काश्मीर मेँ हुर्रियत और गिलानी के कदमोँ तले रौँदी जा रही थी, तो यह कौन सी मर्यादा थी?
कुप्प सी सुदर्शन ने जो कुछ भी कहा, भावना के वशीभूत होकर कहा।वे किसी संसद मेँ नहीँ बोल रहे थे, जो उनपर असंसदीय शब्दोँ के बोले जाने का आरोप लगे।वर्तमान मेँ न तो माननीय सुदर्शन जी पर संघ का कोई दायित्व है और न ही भाजपा की ही उन पर कोई जिम्मेदारी है,उन्होंने जो कुछ भी कहा एक सामान्य नागरिक की हैसियत से कहा और मैंने ऊपर जो भी उदहारण दिए हैं,वे जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के हैं|कहा भी गया है ‘यथा राजा तथा प्रजा’ जब हमारा नेतृत्व ही भ्रष्ट होगा तो नागरिक किस मर्यादा का अनुसरण करेंगे? और यहाँ तो ‘एक होई तो कही समुझाओं,कुपही में यहाँ भंग पड़ी बा’ की तर्ज पर क्या राजा क्या प्रजा सभी चकरघिन्नी नाच रहे हैं,एकदम से नाच बलिये नाच की माफिक|
विरासत में ही हमारे मुंह में इतना जहर ठूंस दिया गया है की अब नेतृत्व को आम नागरिकों से अच्छे आचरण की उम्मीद त्याग देनी चाहिए|यदि आप हमारे मुंह पर तमाचा जड़ने का साहस करते हैं तो आपको भी मुक्का सहने को तैयार रहना चाहिए|यदि आप किसी के विरुद्ध तीखी शब्दावली का प्रयोग करते हैं तो आप को अपने कानों को वज्र बनाना पड़ेगा|किसी ने कुछ भी बोला और आपने उसके कर्यालय को फूंक दिया ‘यह तो बड़ी नाइंसाफी है रे’ इस तरह का आचरण मेरी समझ से परे है|
यह तो एक बानगी भर है..अगर गाँधी और नेहरु के मानस पुत्रों के चरित्र का फुर्सत से पोस्टमार्टम किया जाय तो ३६५ दिन में ३६५० ऐसे मामले प्रकाश में आयेंगे जब इनके किसी न किसी राष्ट्रिय अथवा राज्यस्तरीय नेता ने पानी पी पी कर संघ,भाजपा,हिन्दू,राष्ट्र और यहाँ तक की संविधान तक की खिल्ली न उड़ाई हो,जी भर कर गरियाया न हो| अब अगर…..’हौ इहै एक इच्छा,अरमान एतना बाकी, तू हमरी ओर ताका,हम तोहरी ओर ताकी’ ही वर्तमान राजनीती का यथार्थ है तो “हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है, लूटा तो नहीं हमने,चोरी तो नहीं की हैं” इस तरह की स्थिति पैदा करने के जिम्मेदार तो आप ही हो|